बांस का रकबा हुआ शून्य
बरेली की पहचान बांस बरेली के नाम से भी होती है। ब्रिटिशकाल के बाद भी बरेली में बांस की कई प्रजातियां पाई जाती थीं। यहां बांस के फर्नीचर का बड़ा काम था, लेकिन अब बरेली में बांस का रकबा लगभग शून्य हो गया है। सीबीगंज में वन विभाग के आरबोरेटम और आंवला क्षेत्र के अलावा अन्य स्थानों पर बांस की खेती ही नहीं होती। आरबोरेटम में बांस की कई दुर्लभ प्रजातियों के पौधे उपलब्ध हैं।
विकास के नाम पर काटे 75 हजार पेड़, मिर्जापुर, नजीबाबाद, सिद्धार्थनगर में रोपे पौधे
तीन साल में जिले में विकास के नाम पर 75 हजार से ज्यादा पेड़ों पर आरी चल चुकी है। बरेली-मथुरा, बरेली-पीलीभीत हाईवे और लाल फाटक-रामगंगा के बीच सड़क चौड़ीकरण के लिए काटे गए पेड़ों के बदले पौधरोपण मिर्जापुर, नजीबाबाद व सिद्धार्थनगर में किया गया। दरअसल, जिले में वन विभाग के पास पौधरोपण के लिए भूमि ही नहीं है। प्रमुख वन क्षेत्रों की बात करें तो सीबीगंज, फरीदपुर, आंवला और कुछ मीरगंज में है। शहरीकरण के कारण वन क्षेत्र लगातार सिमट रहा है।