बरेली। बरेली-मुरादाबाद हाईवे पर बड़ा बाइपास बनाने के लिए दस वर्ष पूर्व अधिग्रहीत जमीन के मुआवजे को लेकर फंसा पेज बृहस्पतिवार को भी हल नहीं हो सका। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सदस्य प्रशासन विशाल चौहान और किसान प्रतिनिधि के बीच डेढ़ घंटे की वार्ता विफल रही। किसान अधिग्रहण के समय के हिसाब से मुआवजा मांग रहे हैं और एनएचएआई वर्ष 2008-09 के सर्किल रेट से मुआवजा देने पर तुला हुआ है।
किसानों के प्रतिनिधि हरिनंदन पटेल ने बैठक में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सांसद संतोष गंगवार के गांव ट्यूलिया का सर्किल रेट वर्ष 2008-09 में 40 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर था, लेकिन वहां के किसानों को 61 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजा दिया गया, लेकिन 29 गांवों के 600 किसानों ने मुआवजा इसलिए नहीं लिया, क्योंकि उन्हें पुराने सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा दिया जा रहा है। कहा कि अब वर्ष 2013-14 के सर्किल रेट का औसत निकाल कर मुआवजा देंगे तो स्वीकार कर लेंगे, लेकिन पुरानी दर पर मुआवजा लेने का दबाव बनाया तो मंजूर नहीं है।
एनएचएआई, राजस्व प्रशासन और किसानों के बीच मुआवजे की दर को लेकर वर्ष 2013 से पेंच फंसा है। इस दौरान किसानों ने कई बार प्रदर्शन किए। सांसद के घर पर भी धरना दिया था। कुछ मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। सांसद की पहल पर मामला केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तक पहुंचा था। उनके निर्देश पर ही एनएचएआई के सदस्य प्रशासन यहां आए हैं। उन्होंने बृहस्पतिवार को सर्किट हाऊस में सांसद संतोष गंगवार, भाजपा नेता अनिल सक्सेना, मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल, डीएम रविंद्र कुमार और एनएचएआई के प्रोजेक्ट मैनेजर अनुज जैन के साथ बैठक की, लेकिन हल नहीं निकल सका। अब डीएम किसानों से वार्ता करेंगे।
पुरानी दर से मुआवजे की पेशकश ठुकराई
वर्ष 2013-14 के न्यूनतम और अधिकतम सर्किल रेट की औसत दर निकाली जाए। इसी आधार पर मुआवजा तय करने की मांग की गई। इस पर प्रशासन और एनएचएआई के सदस्य ने सहमति नहीं दी। पुरानी दर से मुआवजा लेने की फिर से पेशकश पर अखिल भारतीय किसान महासभा के पदाधिकारी हरिनंदन पटेल ने कहा कि अगर इस रेट पर सहमत होते तो उसी समय मुआवजा ले सकते थे। असहमति तो पक्षपात वाले रेट को लेकर है।
किसान बोले- नियम हमने नहीं, अधिकारियों ने तोड़े
वार्तास्थल से बाहर किसान प्रतिनिधि ने कहा कि तत्कालीन अधिकारियों ने नियम तोड़े हैं। गलती हमारी नहीं, अधिकारियों की है। वहां मौजूद किसानों ने मीडिया से कहा कि 10 साल से वह अधिकारियों की गलती का खामियाजा भुगत रहे हैं। नियम के मुताबिक, जमीन तभी ली जा सकती है, जब 80 फीसदी किसान सहमत हों, लेकिन 75 प्रतिशत किसानों की सहमति पर ही जमीन ले ली गई। 15 दिसंबर, 2022 को प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन डीएम शिवाकांत द्विवेदी ने किसानों की मांगों को जायज माना और वर्ष 2013-14 के सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा देने के लिए एनएचएआई को पत्र भी लिखा।
फैक्ट फाइल
2390 किसानों की जमीन हुई थी अधिग्रहीत
600 किसानों ने नहीं लिया था मुआवजा
2008-2009 में अधिग्रहण के लिए चयनित की गई थी जमीन
2013-14 में हाईवे बनाने के लिए ली गई थी जमीन
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वर्जन
अधिकारियों का मानना है कि कोर्ट तय कर देगा तो किसानों की मांग के अनुरूप मुआवजा देना पड़ेगा। किसान रेट के लिए कोर्ट में जाना नहीं चाहते हैं। वार्ता जरिये बीच का रास्ता निकालने के लिए हम जुटे हैं। मेरा गांव 30 साल से नगर निगम क्षेत्र में है। इसलिए सर्किल रेट ज्यादा हो गया था। - संतोष गंगवार, सांसद
वर्ष 2003-04 में अधिसूचना हुई। अधिग्रहण 2012-13 व 2013-14 में हुआ। तत्कालीन डीएम की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने 2008-09 के सर्किट रेट को आधार माना था। किसानों से इसी रेट पर सहमति से जमीन ली थी। जिन किसानों ने मुआवजा नहीं लिया है, उन्हें उसी सर्किल रेट पर मुआवजे की पेशकश बृहस्पतिवार को भी की, लेकिन किसान नहीं माने। अब प्रकरण डीएम के सुपुर्द किया गया है। -विपुल जैन, परियोजना प्रबंधक, एनएचएआई मुरादाबाद