बरेली की यूपी 100 का टाइम रेस्पांस हालांकि बिल्कुल दुरुस्त नहीं है, फिर भी मुख्यालय से रोज होने वाले टाइम मैनेजमेंट के मूल्यांकन यह टॉप टेन में आती दिख रही है। जोन के मूल्यांकन में तो यह अक्सर पहला नंबर हासिल कर रही है, लेकिन मानकों के हिसाब से बात करें तो बरेली पीआरवी (पुलिस रेस्पांस वैन) का रेस्पांस अभी भी दो-तीन मिनट तक पीछे चल रहा है। देहात में स्थिति कुछ बेहतर है। यही वजह है कि पूरे जिले के आकलन में बरेली का प्रदर्शन बेहतर चल रहा है।
यूपी 100 के मुख्यालय से रोजाना सभी जिलों की पीआरवी के रेस्पांस टाइम का मूल्यांकन किया जाता है। इसे आधिकारिक रूप से सभी जिलों के साथ शेयर किया जाता है ताकि धीमा रेस्पांस करने वाले जिलों के आगे तेज जिलों को नजीर के तौर पर रखा जा सके। शहर में पीआरवी के पहुंचने का न्यूनतम समय दस और अधिकतम पंद्रह मिनट है। देहात में यह समय बीस मिनट तक किया गया है। शहर और देहात दोनों मिलाकर बरेली जिले की पीआरवी औसतन 15 से 17 मिनट का रेस्पांस दे रही हैं। शुक्रवार रात बारह बजे तक शहर में पीआरवी का रेस्पांस टाइम 13.20 मिनट तो देहात में 18.19 मिनट था। एवरेज रेस्पांस टाइम 15.53 मिनट रहा। शुक्रवार को बदायूं का रेस्पांस टाइम 16.20, पीलीभीत का 24.16 और शाहजहांपुर का 22.03 था। औसतन रोज ही बरेली जिला जोन के नौ जिलों में आगे रह रहा है। छोटे जिले के तौर पर कभीकभार रामपुर ही इससे बेहतर टाइमिंग दे पाता है।
नौ जिलों में 430 पीआरवी
बरेली जिले में 79 पीआरवी संचालित हैं। बरेली जोन के नौ जिलों में कुल 430 गाड़ी दौड़ रही हैं। इनमें रामपुर में केवल 27 ही पीआरवी हैं।
जाम से बिगड़ती है टाइमिंग
शहर में अक्सर जाम और तंग रास्तों की वजह से पीआरवी के घटनास्थल पहुंचने की टाइमिंग लड़खड़ा जाती है। नोडल अधिकारी कमलेश बहादुर स्वीकार करते हैं कि सूचना मिलने से मौके पर पहुंचने तक तीन बार कंट्रोल रूम को लोकेशन देनी होती है। कई बार नेटवर्क गड़बड़ होने से भी टाइमिंग में अंतर आ जाता है।
टाइमिंग ठीक पर फायदा कुछ नहीं
हमने जब भी सूचना दी, पीआरवी मौके पर आ गई। समस्या यह है कि पीआरवी को कार्रवाई का अधिकार नहीं है। थाना पुलिस आरोपियों को छोड़ देती है।- मनोज शर्मा, प्रधान सिहौर
मामूली विवादों को मिला तूल
पति पत्नी के सामान्य झगड़े में भी पीड़ित या पड़ोसी पीआरवी को सूचना देकर छकाते हैं जबकि कई बार वास्तविक पीड़ितों को राहत नहीं मिल पाती। इस पर मंथन होना चाहिए।- रघुनंदन प्रसाद, रिटायर्ड शिक्षक बसई