बरेली। बीते तीन साल से एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) का आंकड़ा दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2022-23 की आखिरी तिमाही में यह 370 करोड़ (अनुमानित) था। चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही में यह 780 करोड़ रुपये जा पहुंचा। इस सत्र के अंत तक आंकड़ा 800 करोड़ के पार पहुंच सकता है। अधिकतम एनपीए खातों वाले बैंकों की सूची में पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) लंबे समय से शीर्ष पर है। इस साल भी सर्वाधिक एनपीए पीएनबी का ही है। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का नंबर आता है। बढ़ते एनपीए का कारण जानने के लिए लीड बैंक अधिकारी वीके अरोड़ा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
- गारंटी-सिक्योरिटी के बिना लघु उद्योगों को दिए गए ऋण एनपीए के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।
- चुनाव नजदीक आने पर कुछ वर्ग विशेष ऋण माफी की उम्मीद में लोन की किस्तें चुकाना बंद कर देते हैं। इस वजह से भी एनपीए बढ़ता है।
- कई बार व्यापार चौपट हो जाने या दूसरे जायज कारणों से भी ग्राहक लोन की किस्तें जमा नहीं कर पाते हैं।
क्या है एनपीए
एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स। बैंक अपनी पूंजी का जो हिस्सा ऋण के रूप में देते हैं, उस पर मिलने वाला ब्याज ही उनकी आय होता है। जब दिए गए ऋण पर ब्याज मिलना बंद हो जाए और ग्राहक मूल राशि भी न लौटाएं तो 90 दिनों की तय समय सीमा के बाद उसे एनपीए घोषित कर दिया जाता है।
दोगुनी रफ्तार से बैंकों का एनपीए बढ़ना निश्चित रूप से चिंताजनक है। चुनावी झुनझुनों पर रोक लगने के साथ ही नियमों को और सख्त बनाने की जरूरत है। अगर एनपीए इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो इसका नुकसान मध्यम आय वर्ग को भुगतना होगा। - डॉ. रीना अग्रवाल, अर्थशास्त्री
जितना ज्यादा एनपीए होता है, उसके हिसाब से ही बैंक को प्रोविजन करके चलना पड़ता है। एनपीए ज्यादा बढ़ने और लगातार बढ़ने से बैंक की आय प्रभावित होती है। अधिक एनपीए बढ़ने से बैंक को लाभ की जगह हानि उठानी पड़ती है। - संदीप कुमार, क्षेत्रीय प्रबंधक, एसबीआई