बाकरगंज की रहने वाली शन्नी और रवीना ने अब पढ़ने की ठानी है। उनको कुछ बनना नहीं, बस अपने बच्चों के सामने खुद को साबित करना है कि वो भी हिंदी अंग्रेजी पढ़ सकती हैं। उनको भी पढ़ना आता है। होमवर्क के बारे में पूछने पर उनके बच्चे अक्सर उनको यह बोल देते थे कि उनको क्या पता स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है। कुछ ऐसे ही हाल में जी रहीं गौरी देवी और सुदामा ने भी शादी के कई साल बाद पढ़ने की ठानी हैं। वह पढ़ लिख नहीं सकती हैं, परिवार में उनको हीन भावना से देखा जाता है। समाज सेवा मंच नाम के सामाजिक संगठन ने जब बाकरगंज में गरीब तबके की महिलाओं को शिक्षित करने की पहल शुरू की तो यह महिलाएं सबसे पहले यहां पहुंची। अपनी व्यथा बताई और कहा कि बच्चों को दिखाना है कि वह भी हिंदी-अंग्रेजी पढ़ सकती हैं। उनको अनपढ़ कहकर बुलाया जाना बहुत चुभता है।