बरेली। खेल निदेशालय की ओर से प्रदेश के 44 छात्रावासों में 50 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की प्रशिक्षक के रूप तैनाती होनी थी, लेकिन आठ-नौ महीनों बाद भी शहर से सिर्फ तीरंदाजी की एक खिलाड़ी की तैनाती हो पाई है।
खेल निदेशालय ने हॉकी, तैराकी, वॉलीबॉल, जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स, क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, टेबल-टेनिस, बास्केटबॉल, कबड्डी, कुश्ती, मुक्केबाजी, जूडो और तीरंदाजी खेल के 44 छात्रावासों में 50 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को 1.5 लाख रुपये प्रति माह के मानदेय पर तैनात किया जाना था। ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, वर्ल्ड कप, चैपिंयनशिप में प्रतिभागी ही इसमें आवेदन कर सकते थे। साथ ही इन खेलों में पदक विजेता व पद्मश्री, खेल रत्न, अर्जुन पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ियों को वरीयता दी जानी थी।
नवंबर माह तक यह योजना फ्लॉप होते दिखाई दे रही थी। छह महीने के बाद एक भी कोच की तैनाती नहीं हुई थी। दो से तीन बार तारीख बढ़ाने के बाद प्रदेश से कुछ खेलों के लिए लोगों ने रुचि दिखाना शुरू की। 15 फरवरी को निदेशालय की ओर से दोबारा 50 खिलाड़ियों के आवेदन मांगे गए। शहर से केवल एक तीरंदाज ने इसमें आवेदन किया। माना जाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी कोच बनने में ज्यादा रुचि नहीं रखते हैं। वह अपने खेल पर ज्यादा फोकस करते हैं।
बैडमिंटन में भी स्टेडियम में कोई कोच नहीं है। हमें दूसरी एकेडमी में प्रशिक्षण लेने के लिए आवेदन करना पढ़ता है। हॉस्टल में रहने वाले खिलाड़ियों को भी कोच का आभाव देखना पड़ रहा है। ऐसे खेलों का विकास कैसे होगा। - काव्या बरनवाल ( बैडमिंटन खिलाड़ी)
क्रिकेट में तो सीनियर खिलाड़ी अपने अभ्यास के दौरान हमें प्रशिक्षण देते हैं। वह अपने खेल पर समय दें या हमें सिखाएं। अगर कोई कोच हो तो खेल का स्तर बढ़ेगा और खेलने में भी आनंद आएगा। - दर्शना ठाकुर ( क्रिकेट खिलाड़ी)
कोरोना से पहले हॉकी के प्रशिक्षक हमें सिखाते थे। लेकिन कोरोना काल के बाद से कोई कोच नहीं है। सभी खिलाड़ी एक-दूसरे को सिखाते हैं और अभ्यास करते हैं। यही कारण है कि नया कुछ नहीं सीख पा रहे हैं। - सूरज सिंह ( हॉकी खिलाड़ी)
पहले कोच थे तो खेलते थे। जब से उन्होंने छोड़ा तब से खेल में दिलचस्पी भी कम हो गई। अब स्टेडियम में अकेले प्रयास करते हैं, लेकिन तकनीक में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। जल्दी कोई कोच आए, ऐसी उम्मीद है। - यसर शमीम ( बास्केटबॉल खिलाड़ी)