देश में नदियाें को बचाने की मुहीम चल रही है। लेकिन लोग इसके प्रति बिल्कुल भी जागरूक नहीं है। प्रमुख नदी को तो लोग पूरी तरह से मारने में जुट गए हैं। नकटिया और किला नदी को पाट कर कब्जा किया जा रहा है। बची एक रामगंगा नदी, जिसकी हालत दिन ब दिन बिगड़ रही है। स्थिति नहीं सुधरी तो यह खुद ही दम तोड़ देगी। हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बरेली में रामगंगा नदी में ऑक्सीजन का स्तर काफी तेजी से घटा है। बरेली से बाहर जहां 7 मिलीग्राम ऑक्सीजन है, वहीं बरेली में कहीं 5 मिलीग्राम तो कहीं 2 मिलीग्राम पाया गया है। जल स्तर भी घटा है।
- ग्लोबल वार्मिंग भी है नदियों के सूखने का कारण
नदियाें पर काम कर रहीं रुहेलखंड विश्वविद्यालय एनिमल साइंस विभाग की प्रो. निलीमा गुप्ता बताती हैं कि नकटिया और रामगंगा नदी का जलस्तर काफी घटा है। इसके पीछे एक कारण ग्लोबल वार्मिंग भी है। हम लोग इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालाें में अचानक से जलवायु में बदलाव आया है जो सचेत करने के लिए है। ग्लोबल वार्मिंग से नकटिया नदी सूख रही है।
बरेली में नदियों के मरने का कारण
- औद्योगिक कारखानाें से निकलने वाला पानी ट्रीट होकर नदी में नहीं छोड़ा जा रहा है।
- घराें से निकलने वाला गंदा पानी भी नदी में जा रहा है। इसके निस्तारण का उपाय नहीं।
- कूड़े के निस्तारण को सॉलिड वेस्ट प्लांट नहीं। खुले में कूड़ा मिट्टी, वायु और भूजल को नुकसान कर रहा है।
- घोबी घाट में कास्टिक युक्त साबुन और तेल का उपयोग खतरनाक है। तेल की परत पानी में जमती है जो ऑक्सीजन को नदी में जाने से रोकती है।
- मूर्ति विसर्जन भी एक बड़ा कारण है। इसमें प्रयुक्त केमिकल पेंट में काफी खतरनाक धातु होते हैं। यह घुलते नहीं है।
से कालागढ़ होते हुए मुरादाबाद, बरेली, फर्रुखाबाद, कन्नौज में गंगा में मिलती है।
- खतरनाक हो गया है पानी
रामगंगा नदी का पानी प्रदूषित होने के चलते त्वचा रोग भी हो सकता है। प्रो. निलिमा बताती हैं कि खतरनाक केमिकल के नदी में मिलने से मछलियां भी प्रभावित होती हैं। इसे इंसान खाएंगे तो उन्हें भी बीमारियां हाेंगी।