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22 सौ करोड़ से बनने जा रहा स्मार्ट सिटी कैसा होगा, यह अनुमान कठिन

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22 सौ करोड़ से बनने जा रहा स्मार्ट सिटी कैसा होगा, यह अभी ठीक-ठीक समझना मुश्किल है लेकिन अनुमान लगाने के कुछ माध्यम जरूर हो सकते हैं। पहला तो यही कि अफसरों की योजनाओं के मुताबिक आप अपनी कल्पना में स्मार्ट सिटी को संजोएं और फिर उसके साकार होने का इंतजार करें। स्मार्ट सिटी का दूसरा पहलू समझने के लिए आपको शहर में सौ करोड़ रुपये से बने तीन सौ बेड के अस्पताल में जाना होगा जहां की बर्बादी और सन्नाटा भी आपको समझने में कुछ मदद जरूर करेगा। आप 20 साल पहले ट्रांसपोर्ट नगर में भी जा सकते हैं और शहर के तमाम इलाकों में अतिक्रमण, गंदगी और प्रदूषण का हाल देखकर भी स्मार्ट सिटी की कल्पना कर सकते हैं।
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चक महमूद नगर के लोग मुसीबतों से परेशान होकर खुद अपने खर्च पर मोहल्ले की सड़क बना रहे हैं। यह भी स्मार्ट सिटी की एक सच्चाई है। इस इलाके को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शामिल करने लायक नहीं समझा गया है। नगर निगम के खजाने में 605 करोड़ का बजट पड़ा हुआ है लेकिन अफसरों को जरूरी नहीं लगा कि इस बजट की एक बूंद चक महमूद नगर की तालाब में तब्दील हुई सड़क पर खर्च कर देते। सालों तक नगर निगम में शिकायतें करने के बाद मोहल्ले के लोग समझ गए कि साहबों का ध्यान सिर्फ सिविल लाइंस में स्मार्ट सिटी बनाने पर है तो चंदा करके खुद सड़क बनाने लगे। चक महमूद नगर की तरह और भी कई इलाके हैं जो आने वाले समय में स्मार्ट सिटी के सामने खुद को तुच्छ और गिरा हुआ महसूस करेंगे। इसी स्मार्ट सिटी के लोग रोडवेज की बस पकड़ने के लिए दस किलोमीटर दूर मिनी बाईपास तक की दौड़ लगाएंगे। हो सकता है कि तब वार्ड और मोहल्लों के चुनाव लड़ने वाले नेता विधायक-सांसदी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हों और पब्लिक को अपने सवालों का जवाब देने वाला भी कोई ढूंढे न मिल पाए। अवैध कब्जों और गंदगी के बीच घटिया, टूटती-फूटती और उजड़ी इमारतें स्मार्ट सिटी की पहचान न बन जाएं, इसकी भी भला कौन गारंटी दे सकता है। कल्पना के स्मार्ट सिटी से बाहर रह गए बाकी शहर की पब्लिक, पार्षद और पूर्व मेयर भी यही सवाल उठा रहे हैं। अमर उजाला की एक रिपोर्ट-
मिशन मैनेजर की गिरफ्तारी ने खड़े किए तमाम सवाल
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में मिशन मैनेजर बनाए गए रिटायर्ड पीसीएस सतीश कुमार की यमुना विकास प्राधिकरण में किए गए 126 करोड़ के घोटाले में हाल ही में गिरफ्तारी के बाद कई सवाल उठे हैं। सतीश कुमार की स्मार्ट सिटी में बगैर किसी नियत प्रक्रिया के सीधे-सीधे नियुक्ति करने वाले अफसरों को अब जवाब देना मुश्किल पड़ रहा है। सिटी मजिस्ट्रेट की मनाही के बावजूद घोटालेबाज सतीश कुमार को किसके आदेश पर सर्किट हाउस में सुइट देने के साथ ही एडीएम कंपाउंड में एक बंगला भी एलॉट किया गया, इसका जवाब देने कोई आगे नहीं आ रहा है। इस मामले में उच्चाधिकारी जांच तक का आदेश नहीं दे पाए लिहाजा स्थिति और भी साफ है। दिलचस्प बात यह है कि अब तक सिर्फ केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने ही स्मार्ट सिटी परियोजना पर सवाल उठाए हैं, बाकी ज्यादातर जनप्रतिनिधि भी इस पर खामोश हैं। नगर निगम से सीधे-सीधे जुड़े जनप्रतिनिधि भी इस पर चुप हैं।
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उठ रहा सवाल.. स्मार्ट सिटी में सिर्फ सिविल लाइंस क्यों
सिविल लाइंस शहर का सबसे विकसित इलाका है, स्मार्ट सिटी का 22 सौ करोड़ का भारी-भरकम बजट स्वप्न सरीखी योजनाओं पर इसी इलाके में खर्च करने की तैयारी है। इस प्रोजेक्ट में बाकी शहर की जरूरतें नजरअंदाज कर दी गई हैं। आरोप यह भी लग रहे हैं कि स्मार्ट सिटी बोर्ड में यूं तो तमाम सदस्य हैं लेकिन फैसले एक-दो अधिकारी ही ले रहे हैं, सदस्यों को बैठकों में सिर्फ एजेंडे पर हस्ताक्षर कराने के लिए बुलाया जाता है। उनके सलाह-मशवरे की इन बैठकों में कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी जाती। पार्षदों को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में बनने वाली योजनाएं हजम नहीं हो रहीं, गाहे-बगाहे सोशल मीडिया पर उनकी प्रतिक्रियाएं भी दिखाई दे जाती हैं लेकिन ज्यादातर पार्षद खुलकर एतराज जताने से बचना ही बेहतर मानते हैं।
पिछड़े वार्डों के पार्षदों का आरोप.. स्मार्ट सिटी में वही इलाके जो कम पैसा लगाकर ज्यादा चमकेंगे

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहर के सभी इलाकों को शामिल किया जाना चाहिए। वर्तमान योजना में पुराना शहर को इससे दूर रखा गया है जहां विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है। यह साफ प्रमाण है कि विकास में भी किस तरह पब्लिक के साथ भेदभाव किया जा रहा है। नगर आयुक्त को चाहिए कि वह इस परियोजना का दायरा बढ़ाएं और पुराने शहर को भी इसमें शामिल करें ताकि लोगों को विकास का लाभ मिल सके। - छंगामल, पार्षद वार्ड 11

जो इलाके पिछड़े हुए हैं और जहां की मौलिक जरूरतें ज्यादा हैं, उन इलाकों में स्मार्ट सिटी के तहत विकास पहले करना चाहिए। मेरा वार्ड पूरी तरह से मलिन बस्ती है। फिर भी इसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में नहीं लिया गया। कोई यह नहीं बता रहा कि जब तक पिछड़े इलाकों का विकास नहीं होगा, शहर स्मार्ट कैसे बनेगा। सिविल लाइंस में एक ही वार्ड मेें तीन ओपन जिम बनाए जा रहे हैं। दूसरे वार्डों में ओपन जिम क्यों नहीं बनाए जा सकते, यह समझ से परे है।
- नरेश शर्मा बंटी, पार्षद हरुनगला, वार्ड 17

स्मार्ट सिटी की हकीकत यदि किसी को देखनी हो तो हमारे वार्ड में आकर देखे। यहां फैली गंदगी आपको बताएगी कि स्मार्ट सिटी बनाने वाले अफसरों में कितनी कर्तव्यपरायणता है। मौलिक सुविधाएं तक न होने के बावजूद इस इलाके को स्मार्ट सिटी में कवर नहीं किया जा रहा। सिर्फ उन्हीं इलाकों में योजनाएं लाई जा रहीं हैं, जो पहले से साफसुथरे हैं और पहले से विकास हुआ पड़ा है। वहां कोई यह सवाल भी नहीं उठाएगा कि कोई काम हुआ या नहीं हुआ।
रेनू, चीनी मिल पार्षद वार्ड 4

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में पुराना शहर के तमाम इलाकों को अछूत बना दिया गया है। वार्ड 40 में नवादा शेखान, बुखारपुरा जैसी कई मलिन बस्ती हैं। इसके बावजूद इस वार्ड को स्मार्ट सिटी में नहीं लिया गया। विकास की जरूरत इस इलाके को है, न कि उन इलाकों को जो पहले से ही चमक रहे हैं। ऐसे में अरबों रुपये खर्च कर विकसित क्षेत्र को चमकाने का क्या औचित्य है। क्या यह प्रोजेक्ट सिर्फ पैसों की बंदरबाट के लिए है। क्या यही लोकतंत्र है। - हरिओम कश्यप, पार्षद वार्ड 40

स्मार्ट सिटी में पुराना शहर की नई आबादी को भी नहीं शामिल किया गया है। पार्कों को शामिल करने की बात की गई लेकिन हमारे क्षेत्र मेें पांच-छह बड़े पार्कों में से किसी एक को भी इसमें शामिल नहीं किया गया। यह पूरी तरह भेदभाव पूर्ण रवैया है। पिछली बार हमने यह सवाल भी उठाया था कि क्या सिविल लाइंस के विकसित क्षेत्र को ही विकसित किया जाएगा लेकिन किसी ने इसका जवाब नहीं दिया। पब्लिक हर रोज इस पर सवाल उठाती है।
- मो. यामीन खां, पार्षद आकाशपुरम वार्ड 43

स्मार्ट सिटी में सिर्फ वे इलाके लिए गए हैं जहां पैसा लगना ही नहीं है। यह इलाके पहले से विकसित हैं। ऐसे में शहर के उन क्षेत्रों का क्या जो पिछड़े हुए हैं और जिन्हें विकास की जरूरत थी। सड़कें चाहिए थी, नालियां और पानी निकासी की जरूरत थी। फिर भी पर इन्हें इस पूरी योजना से दूर कर दिया गया। इन इलाकों में लोग अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं। ऐसी स्मार्ट सिटी का क्या फायदा जो लोगों की मौलिक जरूरतें पूरी न कर पाए।
मो. अंजुम, पार्षद सूफी टोला वार्ड 78

पूर्व मेयर ने कहा, स्मार्ट सिटी छलावा
अधिकारियों की मनमानी चल रही है, जहां चाहें वहां के लिए प्रोजेक्ट बना देते हैं। इन्हें एकतानगर में बीडीए का पार्क नहीं दिखता पर वर्टिकल गार्डन के लिए शहर के पार्क दिख जाते हैं। तमाम शहर में सड़कों के गड्ढे नहीं दिखते। योजना पर योजना बनाए जाते हैं मगर सारी की सारी कागजी। पैसा कहां चला जाता है, किसी को कुछ पता नहीं चलता। स्मार्ट सिटी भी इसी तरह की योजना है। योजनाएं बन रही हैं। अपने हिसाब से इलाकों का चुनाव किया जा रहा है लेकिन वास्तव में इसका लाभ आम आदमी को मिल रहा है या नहीं, यह कोई देखने वाला नहीं। ऐसे में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से शहर के संपूर्ण विकास की उम्मीद करना बेमानी है।
- राजकुमार अग्रवाल, पूर्व मेयर

शहर तभी स्मार्ट बन पाएगा जब शहर के हर इलाके में सम्यक और बराबर का विकास हो। पिछले समय में नगर निगम में 48 से अधिक गांव शामिल किए गए लेकिन इनके विकास के लिए अब तक कोई योजना नहीं बनी है। इन गांवों में सीवर तक की सुविधा नहीं है। नगर निगम क्षेत्र में जो पुराने वार्ड हैं, उनमें से भी आधे वार्डों में सीवर की व्यवस्था नहीं हो पाई है। नालों की स्थिति से लेकर सड़कोें तक हर ओर बदतर हालात दिखाई देते हैं। हर गली-मोहल्ला गंदगी से अटा पड़ा है। ऐसे में अफसर शहर के एक दो इलाकों को चमकाकर बरेली को स्मार्ट सिटी बनाने का कौन सा लक्ष्य हासिल करेंगे, इसे कोई नहीं समझ सकता। - सुभाष पटेल, पूर्व मेयर

शहर को तब तक स्मार्ट सिटी नहीं बनाया जा सकता, जब तक यहां की सीवर, नाली और सड़कों को दुरुस्त नहीं किया जाता। फिलहाल तो हालात ये हैं कि पूरे शहर का गंदा पानी नालों से होकर रामगंगा में गिर रहा है। यहां से रामगंगा में बहकर गंगा को भी मैला कर रहा है। सरकार नमामि गंगे की बात करती है पर इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। शहर में कूड़े का निस्तारण का इंतजाम अब तक ठीक नहीं हो सका। एयर फोर्स की ओर से पिछले 20 सालों से कहा जा रहा है कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था करिए पर आज तक कुछ नहीं हुआ। ऐसे में नया शहर क्या और पुराना शहर क्या। ये कहीं विकास नहीं करेेंगे। सब पैसा बर्बाद किया जाएगा।
- डॉ. आईएस तोमर, पूर्व मेयर

सभी सरकारी योजनाएं उन इलाकों में ही लागू की जाती हैं जो पहले से चमके हुए हों, जहां काम न करना हो ताकि वहां बड़े मंत्री अधिकारी सीधे आएं और देखकर चले जाएं। भीतरी इलाकों में सरकार की कोई योजना लागू नहीं होती। इसीलिए देश का यह हाल है। स्मार्ट सिटी योजना इससे अछूती नहीं है। यदि आज स्मार्ट सिटी में देश के विकसित इलाकों को शामिल किया जा रहा है और पिछड़े क्षेत्रों को इससे दूर किया जा रहा है तो इसमेें हैरत जैसी कोई बात नहीं। इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। निगम के सभी क्षेत्रों में सीवर, पीने का साफ पानी, सड़क और जल निकासी की समुचित व्यवस्था, अस्पताल और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था कर दी जाए तो शहर अपने आप स्मार्ट हो जाएगा। - सुप्रिया ऐरन, पूर्व मेयर

60 करोड़ से स्मार्ट सिटी के लिए तमाम योजनाएं, नगर निगम के खजाने में 600 करोड़ फिर भी कोई काम नहीं
स्मार्ट सिटी के लिए अभी सरकार से सिर्फ 60 करोड़ रुपये का ही बजट जारी हुआ है लेकिन फिर भी अफसर दिन-रात योजनाएं बनाने में व्यस्त हैं। ओपन जिम जैसी कई योजनाओं पर काम भी शुरू करा दिया गया है लेकिन नगर निगम के खजाने में 605 करोड़ रुपये का बजट पड़ा हुआ है लेकिन फिर भी उससे शहर में कोई काम नहीं कराया जा रहा है। अफसरों की मंशा पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि शहर में समस्याओं की भरमार है। सड़कें सबसे ज्यादा खराब हालत में हैं लेकिन फिर भी उनकी मरम्मत तक नहीं कराई जा रही है। ठेकेदारों के पेमेंट अटकाए रहने की वजह से सड़कों के टेंडर तक नहीं हो पा रहे हैं। दूसरी ओर अतिक्रमण, अवैध यूनिपोल और होर्डिंग के खिलाफ भी कुछ नहीं हो रहा है। शहर की सबसे बड़ी समस्या जाम है लेकिन नगर निगम के पास इससे निपटने के लिए कोई योजना नहीं है। शहर के व्यस्त इलाकों में पार्किंग की समस्या एक लंबे समय से मुद्दा बनती रही है लेकिन अफसर खुद ही योजनाएं बनाकर उन पर पानी फेरने के अलावा अब तक कुछ नहीं कर पाए हैं।
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