फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अफसर तो चले जाएंगे.. जनप्रतिनिधि सोच लें जनता को क्या जवाब देंगे

विज्ञापन
विज्ञापन
स्मार्ट सिटी पर पूर्व मेयर सुभाष पटेल और सुप्रिया का मशवरा
विज्ञापन

बरेली। स्मार्ट सिटी फिलहाल सपनों की बात है। अभी जो हकीकत है वो इन सपनों के पूरी तरह उलट है। यह कुछ दिलचस्प सी बात है कि जिन अफसरों के हाथों में स्मार्ट सिटी तैयार करने का दारोमदार है, वे अब तक ऐसी कोई मिसाल पेश नहीं कर पाए जो यह बयां करती कि दुर्दशा में डूबे शहर की भी उन्हें कोई परवाह है। नई मिसाल यह जरूर है कि सिर्फ विपक्ष के लोगों को ही नहीं, सत्ता से जुड़े लोगों को भी स्मार्ट सिटी कोई बेहतर एहसास नहीं करा पा रहा है। अफसरों के दावों और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की बहानेबाजी से इतर बदहाल पानी की सप्लाई, टूटी-फूटी सड़कें, जहां-तहां उफनता सीवर, फ्यूज पड़ी स्ट्रीट लाइट कीचड़ से अटे नाली-नाले, कूड़े के ढेर और कदम-कदम पर अवैध कब्जों जैसी ढेरों ऐसी समस्याएं हैं जो शहर को स्मार्ट सिटी का जरा भी खुशगवार एहसास नहीं करने दे रही हैं। नगर निगम के 79 पार्षदों में से गिने-चुने पार्षद ही हैं जो अब भी यह दावा करने की हिम्मत कर पाते हैं कि शहर बेहतरी की ओर बढ़ रहा है। शहर की मेयर रहीं कांग्रेस नेता सुप्रिया ऐरन के साथ पूर्व मेयर वरिष्ठ भाजपा नेता सुभाष पटेल भी खुलकर कहते हैं कि स्मार्ट सिटी के नाम पर अफसर बरेली की पब्लिक के साथ धोखा कर रहे हैं। पेश है दोनों पूर्व मेयर के साथ अमर उजाला की बातचीत-

जो लोग टैक्स देने वाली पब्लिक को परेशान कर रहे हैं, वे स्मार्ट सिटी क्या बनाएंगे

नगर निगम बोर्ड को शहर की पब्लिक की ओर चुनी गई मिनी संसद या मिनी विधानसभा के तौर पर देखा जाना चाहिए। पब्लिक उम्मीदों के साथ वोट देती है और उसके बदले मौलिक सुविधाएं भी चाहती है। मैंने महसूस किया है कि टैक्स देने वालों की सिर्फ अनदेखी नहीं हो रही बल्कि उन्हें परेशान करने का सिलसिला चल रहा है। सवाल यह है कि क्या दीवारोें पर नारे लिखने स्मार्ट सिटी बन जाएगा। शहर में अब तक कई इलाकों में पुराने मैनुअल शौचालय चल रहे हैं। शहर में कोई विकास नहीं हो रहा है। नगर आयुक्त और मेयर के बीच चल रहा विवाद नीचे से ऊपर तक सबको पता है। पब्लिक का सबसे बड़ा दुखड़ा यह है कि वह अपनी समस्या बताए तो किसे। अफसरों को विवाद से अलग रहकर विकास पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जनता के प्रति जवाबदेही जनप्रतिनिधि की होती है। हालांकि शहर में विकास हो रहा है और दिख भी रहा है। छह पुल बन रहे हैं जो शहर को स्मार्ट ही बनाएंगे लेकिन नगर निगम से पब्लिक को ज्यादा उम्मीदें रहती हैं जो पूरी नहीं हो पा रही हैं। सफाई, पानी, सीवर, सड़क जैसी सुविधाओं पर नगर निगम का फोकस होना चाहिए। जिस संस्था के अफसर और जनप्रतिनिधि मिलकर काम करने की स्थिति में नहीं हैं, वे स्मार्ट सिटी कैसे बना पाएंगे। स्मार्ट सिटी बीडीए की बेहतर भूमिका के बगैर भी नहीं बन सकता। सिर्फ एक-दो अवैध निर्माण ध्वस्त करके और बाकी की अनदेखी करके शहर को स्मार्ट सिटी का सपना नहीं दिखाया जा सकता। अफसर आते-जाते रहते हैं लेकिन पब्लिक को जनप्रतिनिधियों को ही जवाब देना पड़ेगा। लेकिन अफसरों की सभी कामों में अहम भूमिका होती है इसलिए उनके सकारात्मक रवैये के बगैर स्मार्ट सिटी की उम्मीद करना बेमानी है। पांच इंच के गमले में दस फुट का पेड़ लगाने जैसी योजना भी शहर को स्मार्ट नहीं बनाएगी। जिन सड़कों को चौड़ा किया जाना है, उनके किनारे लगे बिजली के खंभे तक अब तक नहीं हट पाएं हैं। हालांकि बिगड़ा सिस्टम सुधारने में समय लगता है, लेकिन ईमानदारी से काम किए बगैर उसे नहीं सुधारा जा सकता।
विज्ञापन

- सुभाष पटेल, पूर्व मेयर

ये लड़ाई-झगड़ा तो बहाना है, स्मार्ट सिटी का बजट नीचे से ऊपर तक सबकी निगाह में है

ऊपर से नीचे तक भाजपा बहुमत है मगर फिर भी विकास कार्यों का स्तर शून्य है। अफसरों और जनप्रतिनिधियों की लड़ाई तो दिखावा है। दोनों में से किसी को भी जनसुविधाओं की परवाह होती तो वह इस झगड़े को बढ़ाने के बजाय शहर की समस्याओं के बारे में सोचता। मैंने तो अपने कार्यकाल में कई बिगड़ैल नगर आयुक्तों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था जबकि उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार तक नहीं थी। आज जिले में वरिष्ठ नेता, मंत्री सभी सक्षम हैं। फिर भी जनता को पूरी बेशर्मी से ठगा जा रहा है। स्मार्ट सिटी पर काम शुरू होने से पहले ही यह प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार और मनमानी में फंस गया है। आखिरकार इसका खामियाजा जनता को ही भुगतना पड़ेगा। हमारे कार्यकाल में स्मार्ट सिटी जैसा बड़ा बजट तक नहीं था, फिर भी समस्याग्रस्त गली-मोहल्लों को चिह्नित कर जरूरत के मुताबिक विकास कराया गया था। अब नगर निगम का बजट आम पब्लिक के कोई काम नहीं आ रहा। शहर में एक कोने पर झुमका लगाकर तालियां बटोरी जा रही हैं। यह नहीं देखा जा रहा कि पुराना शहर, बिहारीपुर, सुभाषनगर, किला, जखीरा, नई बस्ती, गंगापुर जैसे आम इलाके ही नहीं रामपुर बाग और सिविल लाइंस जैसे पॉश कहे जाने वाले इलाके तक समस्याओं से जूझ रहे हैं। जरा ही बारिश से पूरे शहर में पानी भर जाता है। नाले भरे हुए हैं, मच्छरों के प्रकोप से सारा शहर परेशान हैं। नगर निगम करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है लेकिन फिर भी शहर को साफ पानी तक नहीं मिल पा रहा है। स्मार्ट सिटी के नाम पर पैसा फूंका जा रहा है। यह सब नीचे से ऊपर तक बगैर मिलीभगत के नहीं हो सकता। भाजपा नेता और सरकार मंदिर और नागरिकता के नाम पर राजनीति करने की आदी है। जनता को इसी में उलझाए रखने की कोशिश हो रही है। ऐसी हालत में विकास की उम्मीद करना ही बेमानी है। हास्यास्पद बात है कि अफसर और भाजपा नेता लड़ रहे हैं और हाईकमान चुपचाप बैठा है। पॉवरफुल नेताओं ने मौन धारण कर लिया है। यह सब पब्लिक के साथ धोखा है और जनता यह सब समझती भी है।
विज्ञापन

- सुप्रिया ऐरन, पूर्व मेयर
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें