अन्य दिनों में बेचते हैं मोमोज
वीरेंद्र ने बताया कि पुतले बनाने का काम 48 कारीगरों के साथ करते हैं। लेकिन, काम इतना होता है कि उनकी पत्नी शिल्पी भी हाथ बंटाती हैं। एक पुतला बनाने में सात दिन लग जाते हैं। इस बार 500 पुतलों का ऑर्डर मिला है। वह आमतौर पर 20 फुट ऊंचाई तक के पुतले बनाते हैं। 80 फुट के पुतले बनाने में भी कुशल हैं।
दशहरा के बाद अन्य दिनों में कारीगर चाट, मोमोज आदि का ठेला लगाकर जीविका चलाते हैं। बताया कि पहले की तुलना में अब बांस की खपच्ची, पन्नियां और कागज आदि माल-मजदूरी महंगी हो गई है। खानदानी काम है, इसलिए परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
पुतला बनाने वाले मुस्लिम परिवार के सदस्य शहंशाह अली।
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मुस्लिम परिवार निभा रहा परंपरा
बड़ा बाजार के मोहल्ला फूटा दरवाजा में भी कल्लू मियां ने 35 साल पहले पुतले बनाने का काम शुरू किया। अब उनके बेटे शहंशाह अली, शबाब और शादाब सिलसिला बढ़ा रहे हैं। शहंशाह ने बताया कि 12 साल पहले पिता का निधन हो गया। तब से हर साल दशहरा से करीब एक माह पहले रोजगार के लिए पुतले बनाते हैं। पिता को नैनीताल और हल्द्वानी तक से पुतले बनाने के ऑर्डर मिलते थे, लेकिन अब स्थानीय काम ही बचा है। इसके अलावा मोहर्रम में ताजिये और दीपावली में कंडील बनाने का काम करते हैं।