अगर मन में कुछ पाने की ठान लो तो कई बार कमजोरी ही ताकत बन जाती है। नवाबगंज के एक छोटे से गांव सुंदरी के रहने वाले मुनेंद्र पाल ने एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद कामयाबी का शिखर छुआ है। पहले एकेटीयू में पूरे प्रदेश में अपनी मेधा का लोहा मनवाया और अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एआईईए-पीजी 2018 में उसने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई है। उसने विकलांग कोटे में आल इंडिया आठवीं और ओबीसी में आल इंडिया 326 रैंक हासिल की है। सेल्फ स्टडी के दम पर उसने यह कामयाबी हासिल की है। मुनेंद्र का मानना है कि अगर लक्ष्य तय हो और कुछ पाने का जुनून तो कमजोरी ताकत बन जाती है।
नवाबगंज के सुंदरी गांव के रहने वाले मुनेंद्र पाल के पिता विद्या राम किसान है। चार भाइयों में वह में वह सबसे छोटे है। बड़े भाई रमेश चंद्र घर पर रहते हैं तो दो भाई प्राइवेट सेक्टर में जॉब करते हैं। मुनेंद्र पाल ने प्राथमिक शिक्षा गांव में ही पूरी करने के बाद नवाबगंज के श्रीकृष्णा इंटर कॉलेज से हाईस्कूल किया। उसके बाद ड्रमंड राजकीय इंटर कॉलेज पीलीभीत से इंटर की पढ़ाई की। मुनेंद्र का सपना था इंजीनियरिंग का प्रोफेसर बनना। इंटरमीडिएट के साथ ही उसने 2015 में एकेटीयू की इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लिया। कैटेगरी में प्रदेश में पहली रैंक हासिल की। सीसीएस यूनिवर्सिटी मेरठ उसने 2016 में बीटेक किया है। उसके बाद वह मेरठ से ही बीटीसी की। मुनेंद्र कहते हैं उनका सपना प्रोफेसर बनने का है इसलिए एमटेक करने के लिए आइसीएआर एआईईईए पीजी 2018 के एंट्रेंस में शामिल हुआ। दिव्यांग होने के सवाल पर मुनेंद्र कहते हैं कि बचपन में थोड़ा एहसास होता था, लेकिन कभी इसे हावी नहीं होने दिया। स्कूल टाइम से ही उन्होंने सेल्फ स्टडी पर फोकस किया। आज सेल्फ स्टडी के दम पर ही इस मुकाम तक पहुंचे है। आइसीएआर एआईईईए में उन्होंने कैटेगरी आठवीं रैंक हासिल की है। मुनेंद्र कहते हैं वह प्रतिदिन सात से आठ घंटे पढ़ते थे। हमेशा एक टारगेट बनाकर पढ़ा और हमेशा उसका फायदा मिला। उनका कहना है कि उनको देखकर उनके जैसे जो भी दिव्यांग छात्र होंगे उनको आगे बढ़ने का हौसला मिलेगा।