बरेली। फाइलेरिया रोग फैलाने वाले परजीवी की चपेट में सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि पशु भी आ रहे हैं। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में एक गोवंश के नमूने की जांच में फाइलेरिया की पुष्टि हुई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पशु प्रजातियों में सबसे ज्यादा कुत्ते इस रोग से पीड़ित होते हैं।
बदायूं के नैनीनगला निवासी एक पशुपालक की गाय कई दिनों से बीमार थी। पशु चिकित्सकों को दिखाया, लेकिन सेहत में सुधार नहीं हुआ। लिहाजा, व्यक्तिगत खर्च पर आईवीआरआई में जांच के लिए नमूना भेजा। आईवीआरआई सेंटर फॉर एनिमल डिजीज रिसर्च एंड डायग्नोसिस (कैडरेड) में नमूने की जांच में पशु के बुखार, दस्त, डाउन सिंड्रोम आदि लक्षण के आधार पर संबंधित रोगाें की गई। इसमें फाइलेरिया की पुष्टि हुई। जिसकी सूचना पशुपालक को कॉल कर दी गई। साथ ही, उन्हें पशुचिकित्सक को दिखाकर इलाज शुरू कराने के लिए भी परामर्श दिया गया।
आईवीआरआई पॉलीक्लीनिक के पूर्व इंचार्ज डॉ. अमरपाल सिंह के मुताबिक फाइलेरिया वुचेरेरिया बैनक्रॉफ्टी या ब्रुगिया मलेई परजीवी से होता है। इससे संक्रमित मच्छर पशु को काटे और रक्त में परजीवी पहुंचें तो रोगी हो सकते हैं। गोवंश के चपेट में आने का पहला मामला हो सकता है।
घबराएं नहीं... पशुओं में संक्रामक नहीं होता फाइलेरिया
पशु चिकित्साधिकारी रामलखन के मुताबिक कुत्तों के फाइलेरिया की चपेट में आने के मामले ज्यादा होते हैं। बड़े पशुओं में कुछेक मामले होते हैं। इंसान की तरह पशु में फाइलेरिया गंभीर नहीं होता, क्योंकि पशुओं की रोग प्रतिरोधी क्षमता इंसानों से कई गुना ज्यादा होने से परजीवी पूरी तरह हावी नहीं होता। रोग का इलाज दवा से मुमकिन है। डेयरी या फार्म में मौजूद अन्य पशुओं में संक्रमण की आशंका नहीं होती। हालांकि, इलाज के लिए अलग से बेहतर निगरानी जरूरी है।
जूनोसिस लेकिन संक्रमित पशु से इंसानों को खतरा नहीं
जिला मलेरिया अधिकारी सत्येंद्र कुमार के मुताबिक जिले में फाइलेरिया के 168 मरीज हैं। ये क्यूलेक्स क्विंक्वेफैसियाट्स और मैनसोनिया प्रजाति के मच्छरों से फैलता है। यह ऐसी जूनोसिस बीमारी है जिसमें इस रोग से संक्रमित पशु से इंसानों को कोई खतरा नहीं होता। हालांकि, संक्रमित व्यक्ति को अगर क्यूलेक्स मच्छर काट लें और फिर पशु को काट लें तो पशु चपेट में आने की आशंका रहती है। बताया कि संक्रमित पशु में इंसान की तरह एलीफेंटियाटिस यानी हाथीपांव नहीं होता है। ब्यूरो