अक्षरा फाउंडेशन की ओर से जश्न-ए-अक्षरा का आयोजन बिशप मंडल इंटर कालेज में किया गया। इसमें प्रसिद्ध शायर आलोक यादव (पीएफ कमिश्नर) के उर्दू और हिंदी भाषा के गजल संग्रह ‘उसी के नाम’ का विमोचन किया गया।
इस मौके पर मुख्य अतिथि प्रसिद्ध शायर डा. माजिद देवबंदी ने महफिल को अपनी शायरी से नवाजते हुए कहा- खुद को भी आजमाओ तो पहले। कुछ नया कर दिखाओ तो पहले।। बन ही जाएंगे मंदिरो मस्जिद, दिल से दिल को मिलाओ तो पहले। विशेष अतिथि प्रसिद्ध कवि डा. जितेंद्र जौहर ने भ्रष्टाचार को केंद्रित करते हुए कहा- संसद में बिकने लगा खुले आम ईमान, हमने तो देखी नहीं इतनी बड़ी दुकान। उन्होंने साधू संतों की राजनीति पर भी व्यंग किया।
अध्यक्षता करते हुए मशहूर शायर अकील नोमानी ने जिंदगी से जुड़ा रुहानी कलाम पेश किया- मजा है कैद में लेकिन, रिहा होना पड़ेगा। तुझे ऐ जिंदगी आखिर फना होना पड़ेगा। इसी कड़ी में आलोक यादव, सिया सचदेवा, डा. अवनीश यादव, सचिन अग्रवाल, डा. शगुफ्ता गजल, अनवर वारसी, विकास अग्रवाल, आदित्य प्रकाश, शिव नाथ बिस्मिल ने भी कलाम पेश किया।
पुस्तक के बारे में डॉ. माजिद देवबंदी ने कहा जहां लोग जुबानों को मजहब से जोड़ रहे हैं, वहां आलोक यादव जैसे लोग गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाने में अहम किरदार अदा कर रहे हैं। इनकी पूरी किताब में कहीं भी ऐसा शेर पढ़ने को नहीं मिला जो हमारे अदब का मयार न हो। डॉ जौहर बोले-हिंदी पट्टी के आने वाले तमाम तर शायरों के बीच आलोक यादव की शायरी उत्कृष्टता के नए कीर्तिमान रखती है। अकील नोमानी का राय थी कि आलोक यादव का पहला मजमुआ-ए-कलाम आज के दौर में शेरों अदब की बका से मुताल्लिक मायूसियों के अंधेरे में एक रोशन चिराग की तरह हमारे सामने आता है। मुझे यकीन है कि इस मजमुए कलाम का शेरो अदब के शैदाई इस्तकबाल करेंगे।
इससे पहले अतिथियों ने आलोक यादव के गजल संग्रह का विमोचन किया। डा. माजिद देवबंदी को अक्षरा साहित्य सम्मान से नवाजा गया। साथ ही शिव नाथ बिस्मिल को सरदार जिया रिजवी स्मृति सम्मान से अभिनंदित किया गया। संचालन डा. अवनीश यादव ने किया। संयोजन सचिन अग्रवाल का रहा।
देश में परिवर्तनकामी साहित्य की जरूरत: डा. जितेंद्र
सद्भाव से हर व्यक्ति हाथ गहें, जो बात कहें प्रेम की सीमा में कहें। मतभेद हजारों हों, कोई बात नहीं। हम एक थे हम एक हैं हम एक रहें। इन लाइनों के साथ सोनभद्र से आए कवि डा. जितेंद्र जौहर ने कहा कि देश में जो हालात हैं उसमें परिवर्तनकामी साहित्य के हस्तक्षेप की जरूरत है। असहिष्णुता की बात चल रही है। राजनीतिक दल के नेताओं को अदब व साहित्य से अपना लबो लहजा उठाना चाहिए। वर्तमान राजनीति पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियां जो समाज को विखंडन की कगार पर ले जाएं उन पर अंकुश लगना बहुत जरूरी है। तभी देश तरक्की कर पाएगा।
जुबानों को मजहब से जोड़ना ठीक नहीं: डॉ. माजिद
जुबानों को भी मजहब से जोड़ा जा रहा है। जो बेहद फिक्र की बात है। मशहूर शायर डॉ. माजिद देवबंदी ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि मुशायरा जो हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक था उसकी तस्वीर बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान राजनीति पर डॉ. माजिद का कहना है कि आजादी के बाद से सियासत पर कभी इतना बुरा वक्त नहीं पड़ा कि एक छोटे राजनीतिज्ञ से लेकर प्रधानमंत्री तक सारी गरिमाओं को लांघ कर वो सब बोला जा रहा है जो हमारे सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है। इसी तारतम्य में उन्होंने एक शेर भी कहा- खुद को भी आजमाओ तो पहले। कुछ नया करके दिखाओ तो पहले।। बन ही जाएंगे मंदिर-ओ-मस्जिद, दिल से दिल को मिलाओ तो पहले।