फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विजय दिवस: वीरगाथा सुनाकर सेना के पराक्रम को किया सलाम

विज्ञापन
विज्ञापन
बरेली। विजय दिवस पर सोमवार को जाट रेजिमेंट सेंटर के युद्ध स्मारक पर शहीदों को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। भारत-पाकिस्तान युद्ध में शामिल रहे तमाम सैनिकों की मौजूदगी में वीर नारियों को भी सम्मानित किया गया। शहादत को सलाम करते हुए जवानों की आंखें नम थीं लेकिन सीना फख्र से चौड़ा था।
विज्ञापन

यूबी एरिया के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल सीपी मोहती (एवीएसएम, एसएम, वीएसएम), जाट रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट बिग्रेडियर इंद्रजीत सिंह (शौर्य चक्र, सेना मेडल) समेत अन्य सेवानिवृत्त अफसरों, पूर्व सैनिकों ने शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित कर सलामी दी। इसके बाद जीओसी ने वीर नारियों को सम्मानित कर भारत-पाक युद्ध में शामिल रहे पूर्व सैनिकों के साथ युद्ध के अनुभव साझा किए। पूर्व सैनिकों और वीरनारियों से उनकी समस्याएं भी पूछीं और उनके निस्तारण का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि 16 दिसंबर, 1971 को पूर्वी पाकिस्तानी फोर्स के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एके नियाजी ने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ भारत के सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
जीओसी ने जवानों में जगाई देशप्रेम की अलख
जीओसी यूबी एरिया लेफ्टिनेंट जनरल सीपी मोहती ने कार्यक्रम समापन पर जवानों में देशप्रेम की अलख जगाई। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के जवान ‘वालंटियर’ होते हैं लेकिन पाकिस्तानी सेना ‘हुकुम’ से चलती है। कहा, भारतीय सेना अनुशासन, वीरता, पराक्रम और शौर्य के साथ संघर्ष की भी परिचायक है। एक ओर रेगिस्तान के गर्म टीले तो दूसरी ओर सियाचिन के माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी देश की सुरक्षा के लिए तैनात है। देश की सेवा का इससे बढ़कर अनुपम उदाहरण और कोई नहीं हो सकता है।
विज्ञापन


शहादत की सूचना खून से रंगे कपड़ों ने दी
बल्लिया के गांव धनारा की रहने वाली फूला देवी के पति सिपाही अंगनलाल भारत-पाक के ऐतिहासिक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। 74 वर्षीय फूला देवी ने बताया कि 1971 के युद्ध के तीन साल पहले ही उनकी शादी हुई थी। युद्ध में जाते हुए उन्होंने आने का वादा किया था। उस दौरान वह पठानकोट में तैनात थे। बताया कि करीब दो माह बाद वह तो नहीं लौटे लेकिन उनके खून से रंगे फटे हुए कपड़े उन्हें मिले। जो जवान वर्दी देने आए थे, उन्होंने शहादत की सूचना दी। शव के बारे में पूछा तो बताया कि बहादुर सिपाही अंगनलाल बम विस्फोट में शहीद हुए। उनका शव घर नहीं भेजा जा सकता था। बोलीं, शव नहीं आया था सो उन्होंने मान लिया कि हो सकता है उनके पति जीवित हों, यही मानकर उन्होंने उम्र के पचास साल ससुराल में ही गुजार दिए।

घायल होकर भी करते रहे दुश्मनों का सामना
बीआई बाजार की शहीद कॉलोनी की रहने वाली नीमा नेगी ने बताया कि उनके पिता एएमसी में तैनात रहे बीएस नेगी दुश्मनों की गोली से बुरी तरह जख्मी हो गए थे। उनकी रीढ़ की हड्डी भी कई जगह से टूट गई थी, फिर भी वह दुश्मन से लोहा लेते रहे। हालांकि बाद में ठीक से इलाज न होने से वह पूरी तरह दिव्यांग हो गए थे। लंबे समय तक व्हील चेयर पर जीवन गुजारा। कहा, पिता जी बताते थे कि पहले भारत के पास हथियार कम थे इसलिए उस वक्त की लड़ाइयों में भारत पूरी ताकत से हमला नहीं कर पाता था, लेकिन 1971 के युद्ध में पहली बार भारतीय सेना का पराक्रम दिखा। करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने एक साथ एक ही दिन भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। इस ऐतिहासिक जीत में योगदान देने पर वह हमेशा युद्ध की बात बताते हुए गौरवान्वित होते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें