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Budaun: मेरठ के बाद बदायूं में भी फैली थी विद्रोह की आग, कई क्रांतिकारियों को दी गई फांसी, यहां मिलेंगे निशां

Fri, 05 Aug 2022 01:08 AM IST
बरेली ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

मेरठ की क्रांति के बाद 15 मई 1857 को बदायूं में विद्रोह की चिंगारी भड़क गई थी। इसका सबसे पहले असर बिल्सी के बेहटा गुसांई में दिखा। लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
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कलक्ट्रेट परिसर में बना शहीद स्थल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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साल 1857 में स्वतंत्रता संग्राम की पहली क्रांति मेरठ से शुरू होने के कुछ दिन बाद ही 15 मई 1857 को बदायूं में विद्रोह की चिंगारी भड़क गई थी। इसका सबसे पहले असर बिल्सी के बेहटा गुसांई में दिखा। लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।

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आंदोलन कुचलने के लिए कलेक्टर विलियम एडवर्ड्स ने एटा, मुरादाबाद, शाहजहांपुर और बरेली जिलों से मदद मांगी। इस दौरान विद्रोह की आग पूरे जिले में फैल चुकी थी। एक जून 1857 को बरेली की ब्रिगेड ने विद्रोह कर दिया। एक साल तक यह ज्वाला इसी तरह जलती रही। आंदोलन की धधकती आग पर अंग्रेजों ने अप्रैल 1858 में काबू पा लिया। दर्जनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को फांसी दे दी गई और हजारों को जेलों में ठूंस दिया गया। 1857 में उठी क्रांति की ज्वाला शांत जरूर हो गई थी, लेकिन यह पूरी तरह से बुझी नहीं थी।

एक मार्च 1921 को महात्मा गांधी का आगमन बदायूं हुआ तो एक बार फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में जोश भर गया। 1921 में ही गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बदायूं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1929 में महात्मा गांधी फिर बदायूं आए। 26 जनवरी 1930 का दिन बदायूं के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में दर्ज है। इस दिन एक सभा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवीर सहाय ने पूर्ण स्वराज पर एक घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया। जून 1932 में अंग्रेजों ने सैकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जेलों में ठूंस दिया। 1933 तक ये लोग फतेहगढ़ जेल में रहे। इस दौरान जिले में स्वतंत्रता आंदोलन कुछ कमजोर हुआ। 1941 में सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुआ तो जिले में क्रांति की ज्वाला फिर धधक उठी। 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ने क्रांतिकारियों में एक बार फिर जोश भर दिया। जंग बहादुर जौहरी, कुंवर रुकुम सिंह, चौधरी तुलसीराम, पंडित निरंजन लाल, चौधरी बदन सिंह जैसे सैकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आंदोलन के कारण 1942 से 1945 के बीच अंग्रेजी सरकार के पैर उखड़ने लगे।
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गुलड़िया में तोड़ा गया नमक कानून
जिले में नमक सत्याग्रह सबसे पहले गुलड़िया से शुरू हुआ। गुलड़िया में नमक कानून तोड़ने की सूचना पूरे जिले में फैल गई और जिले में जगह-जगह लोग नमक कानून को भंग करने लगे। दूसरे कई जिलों के लोग भी सत्याग्रह में हिस्सा लेने बदायूं पहुंचने लगे। गांव में नमक कानून तोड़ने के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे। बताया जाता है कि नमक कानून भंग करते समय करीब 15 से 20 हजार लोग यहां मौजूद रहे।

शहीद स्थल के पास दी जाती थी फांसी, कोठरी में रहता था जल्लाद
वर्तमान में कलक्ट्रेट में शहीद स्थल के पास ही एक जगह है, जहां अंग्रेजी हुकूमत के दौरान फांसी दिए जाने के बाद शहीदों को दफन किया जाता था। बताया जाता है कि उस समय इस जगह पर एक कुआं था। इसके पास ही एक इमली के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी दी जाती थी। इन दोनों जगह के बीच जल्लाद की कोठरी है। इसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि इसी कोठरी में जल्लाद रहता था।
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स्रोत: रघुवीर सहाय की पुस्तक ‘बदायूं जिले का स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’

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