काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं. मदन मोहन मालवीय का बरेली से भी गहरा नाता रहा है। हालांकि वह महज एक बार ही बरेली आए लेकिन यहां के लोगों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। चार जून 1912 को आए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल ने महामना के नेतृत्व में शहर से चंदा इकट्ठा करने के लिए विशाल जुलूस निकाला था। उनके आह्वान पर बरेली की जनता ने विश्वविद्यालय निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दिया।एक ही दिन में 65 हजार रुपये से अधिक राशि इकट्ठा हो गए थे।
दरभंगा नरेश के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल मुरादाबाद होते हुए चार जून 1912 को बरेली आया था। इस प्रतिनिधिमंडल में महामना के साथ मुरादाबाद से सेठ बृजनंदन प्रसाद भी थे। रेलवे स्टेशन पर भव्य स्वागत हुआ। किला से लेकर शहामतगंज तक शहर के प्रमुख बाजारों से होते हुए एक भव्य जुलूस निकला था। पं. राधेश्याम कथा वाचक की आत्मकथा और उस समय के अंग्रेजी अखबार लीडर में जिक्र है कि किला से लेकर शहामतगंज बाजार तक दुकानदारों ने सड़क की पानी से धुलाई की थी। हर दुकानदार ने अपनी दुकान रंगबिरंगी झालरों से सजाई थी । मुसलमानों ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। मोहम्मद असगर अली खान के नेतृत्व में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने कोतवाली के पास स्टाल लगाकर पान, इलायची और शरबत बांटा था।
पांच जून को बाबू बलदेव प्रसाद ने सभा का आयोजन किया, जिसमें महामना ने जनता को हिंदू विश्वविद्यालय की आवश्यकता के बारे में बताया। उन्होंने सभी वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर विश्वविद्यालय की रूपरेखा के बारे में चर्चा कर धन इकट्ठा करने की अपील की। अंदाजा लगाया जा सकता है जिस समय सामान्य तनख्वाह दस रुपये हुआ करती थी, बरेली शहर ने जेवर और सामान के अतिरिक्त 65 हजार रुपये से अधिक दान दिया था। मालवीय जी ने एक दिन पहले निकले जुलूस के बारे में जिक्र किया था कि उन्होंने आज तक ऐसा जुलूस नहीं देखा। छह जून को रायबहादुर दामोदर दास ने एलन क्लब में पं. राधेश्याम कथा वाचक की भजन संध्या का आयोजन किया था। इन भजनों से मिली धनराशि भी विवि को दी गई।
पं. राधेश्याम ने दी थी पूरी रायल्टी
पं. राधेश्याम ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि महामना के आह्वान के बाद उन्होंने लेखन से मिली पूरी धनराशि विवि को दे दी। पं. राधेश्याम के पौत्र काशीनाथ शर्मा बताते हैं कि इसका जिक्र है बल्कि उस समय के अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा था।