उत्तराखंड के गठन के बाद से ही दबी जुबान में ही रुहेलखंड राज्य की मांग का मुद्दा यूपी की सियासत में समय-समय में सतह पर आता रहा है। बरेली मंडल और आसपास के जिलों को जोड़कर छोटे राज्य की परिकल्पना की गई थी। सियासी दल रुहेलखंड राज्य की मांग को हवा तो देते रहे, पर कभी इसकी खुलकर वकालत नहीं की।
उत्तराखंड का प्रवेश द्वार माने जाने वाले इस क्षेत्र से पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त त्रिपाठी का भी गहरा जुड़ाव था। रुहेलखंड परिक्षेत्र के सात जिलों का एक और राज्य बनाने की मांग उनके भी सामने पहुंची थी। इसमें शाहजहांपुर, बरेली, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर और बदायूं को शामिल करते हुए छोटे राज्य की परिकल्पना तैयार हुई थी।
पर, बड़े पिछड़ा वोट बैंक के चलते राजनीतिक दलों ने रुहेलखंड राज्य के गठन को दबाकर ही रखा। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे रुहेलखंड पर समाजवादी पार्टी ने भी कब्जा जमाया। पिछले एक दशक से यह भाजपा का गढ़ बन चुका है। मगर, अलग राज्य की मांग किसी दल को रास नहीं आई।
इसलिए परवान नहीं चढ़ा मुद्दा
- रुहेलखंड में सैनी, शाक्य, कश्यप, धीमान, कुर्मी, लोध सहित अन्य जातियों की निर्णायक भूमिका वाले इस क्षेत्र में सियासी लाभ-हानि के चलते इस मुद्दे को दबाया ही गया। यहां मुस्लिम मतदाता भी चुनाव में अहम रोल अदा करते हैं।
- जातीय गठबंधन और वोट बैंक की राजनीति भी इस मुद्दे को ठंडा करने की अहम वजह रही है। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर विद्यार्थी इस मुद्दे पर कहते हैं कि छोटे राज्य की मांग बहुत हद तक ठीक नहीं होती है। रुहेलखंड राज्य की मांग तो उठी थी, मगर यह बहुत प्रभावी नहीं हो पाई।