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लॉकडाउन: जिन फैक्ट्रियों का चक्का जमकर चलाया, उनसे जीएसटी क्यों नहीं आया

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Commercial Tax Department - फोटो : social media
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वाणिज्य कर विभाग टैक्स में कर रहा है खेल, कारोबार होने पर भी राजस्व गिरा

बरेली। कोरोना संकट से कुछ समय पहले बात चली थी कि शहर में लोहा कारोबार पर माफियाराज इस कदर हावी है कि उस पर जीएसटी तक नहीं वसूल की जा रही। हालांकि ये आरोप हवा में ही घूमकर रह गए और उनकी सत्ययता की पुष्टि नहीं हो पाई। इसके बाद हाल ही में वित्त मंत्री रहे कैंट विधायक राजेश अग्रवाल ने वाणिज्य कर विभाग के ही एक सेमिनार में यह कहकर सनसनी फैला दी कि भ्रष्ट अफसरों ने जीएसटी को बेमायने कर दिया है। अब कोरोना संकट में रिकॉर्ड राजस्व गिरावट दिखाने पर अफसर फिर घिरने लगे हैं। उद्यमी ही पूछ रहे हैं कि जब लॉकडाउन में फैक्टरियां चलती रहीं तो राजस्व क्यों नहीं आया।
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वाणिज्य कर विभाग के आंकड़ों में बरेली मंडल में 96 प्रतिशत से ज्यादा राजस्व गिरावट दिखाई गई है। न्यूनतम राजस्व कमी भी 58 प्रतिशत बताई गई है। वाणिज्य कर विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक बरेली मंडल में पिछले साल अप्रैल में करीब 85.41 करोड़ रुपये राजस्व अर्जित हुआ था लेकिन इस बार अप्रैल में विभाग ने 90.13 प्रतिशत की गिरावट दिखाई है। टैक्स वसूल करने में सबसे ज्यादा बदायूं और शाहजहांपुर जिले पिछड़े बताए गए हैं। बरेली में 94.62 प्रतिशत तक राजस्व कमी बताई गई है। यानी सेक्टर पांच टैक्स वसूली में सबसे पीछे है जबकि इस सेक्टर में औद्योगिक इकाइयां शामिल हैं। सेक्टर आठ भी किसी से कम नहीं है, यहां पर भी 94.62 प्रतिशत राजस्व गिरावट दर्ज है। यही स्थिति कारपोरेट सर्किल में 92.46 प्रतिशत है।

फैक्टरियां चल गईं फिर भी टैक्स में इतनी गिरावट कैसे

उद्यमी आरोप लगा रहे हैं कि वाणिज्य कर विभाग ने राजस्व वसूली के आंकड़ोें में बाजीगरी दिखाकर भ्रमित करने की कोशिश की है। लॉकडाउन में भारी जीएसटी में जितनी भारी गिरावट दिखाई गई है, उस पर सीधा सवाल उठता है कि इस अवधि में तो ज्यादातर उद्योग चालू हो गए थे। बरेली जोन में एक कारपोरेट सर्किल है। इस सर्किल में पांच करोड़ रुपये से ज्यादा टर्नओवर करने वाली इकाइयां शामिल होती हैं। विभाग ने सर्किल में सिर्फ 2.12 करोड़ रुपये अप्रैल में राजस्व प्राप्ति दर्शाई है। यह राजस्व पिछले वर्ष 2019 अप्रैल में करीब 27.80 करोड़ रुपये था। यानी पिछले साल के मुकाबले इस बार अप्रैल में 92.36 प्रतिशत की गिरावट।
बता दें कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगा था। इसके बाद 24 अप्रैल से लॉकडाउन लागू हो गया। इस बीच बरेली में बंद ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां सरकार ने चालू करा दी थीं। इन कारखानों में उत्पादन के बाद माल की सेल भी हुई, इसके बावजूद राजस्व में 92.36 प्रतिशत की गिरावट आश्चर्यजनक मानी जा रही है। दरअसल बरेली में इस समय सवा दो सौ ज्यादा औद्योगिक इकाइयां चल रही हैं। लॉकडाउन में सभी बड़ी इकाइयां शुरू होने पर विभागीय अफसर जीएसटी कमी का उचित कारण बताने के बजाय गोलमोल तर्क दे रहे हैं। वजह यह है कि रिटेल और थोक कारोबार काफी हद तक चोरी-छिपे चल रहा है। सवाल यह है कि कारोबार चोरी से चले या सार्वजनिक, टैक्स तो जमा होना ही चाहिए क्योंकि ग्राहक से तो जीएसटी की वसूली हो ही रही है। कारोबारी बताते हैं कि लॉकडाउन में सबसे ज्यादा लोहा, बजरी, रेत आदि जिंस मंडल में आ रहा है। शहर में खुले आम इसका कारोबार भी हो रहा है, बावजूद इसके राजस्व में कमी क्यों है।

लॉकडाउन में कारोबार बंद होने से राजस्व गिरा है। यह भी हो सकता है कि लॉकडाउन में कारोबारी अपना जीएसटी जमा करने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रहे हो। वैसे भी लॉकडाउन में टैक्स और रिटर्न भरने की छूट दी गई है। - गौरी शंकर, उपायुक्त प्रशासन

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अफसरों से जवाब मांगा जाएगा कि ज्यादातर इकाइयां चलने पर भी जीएसटी में भारीभरकम गिरावट क्यों आई है, जरूरी कारोबार भी हो ही रहा है। बाहर से सामान भी पहुंच रहा है। ऐसी स्थिति में जीएसटी के आंकड़ों में साफ धांधली लग रही है। - पवन अरोरा, सदस्य, व्यापारी कल्याण बोर्ड

पूर्व वित्त मंत्री ने कहा था- वाणिज्य करके अफसर भ्रष्टाचारियों के मुरीद

कुछ महीने पहले वाणिज्य कर विभाग की ओर से ही आईवीआरआई में आयोजित एक सेमिनार में प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस विभाग के अफसरों की जमकर बखिया उधेड़ी थी। उन्होंने कहा कि विभाग में खुला भ्रष्टाचार बरकरार है। अफसर टैक्स चोरी करने वालों के मुरीद हैं और साफ-सुथरा काम करने वालों को प्रताड़ित करते हैं। सर्वाधिक कार्रवाई ईमानदार व्यापारियों होती है। उन्होंने कहा था कि विभाग को रेवेन्यू बढ़ाना है तो इसके लिए भ्रष्टाचार को शून्य करना होगा।
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