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साक्षर बनाने वाले तो बिना वेतन घर बैठे हैं

Thu, 08 Sep 2016 01:57 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
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अंतराष्ट्रीय साक्षरता दिवस विशेष पर दुनिया की आंकड़बाजी अपनी जगह लेकिन सरकारी ढपोरसंखी की पोल खोलने के लिए बरेली का नमूना काफी है। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया साक्षर भारत मिशन यहां तो पूरी तरह से पस्त चल रहा है। प्रेदश सरकार बजट दे नहीं रही, वेतन तक नहीं मिल रहा। प्रेरक ही किनारे खड़े हो गए हैं तो साक्षर बनाएगा कौन?
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निरक्षरों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए प्रेरकों का 36 महीने का वेतन बकाया है। ऐसे में कुल नियुक्त 2014 प्रेरकों में से 513 नौकरी छोड़ चुके हैं।  इस वर्ष साक्षरता मिशन को कुल 1 लाख 20 हजार निरक्षरों को साक्षर करने का टारगेट मिला है। सरकारी आंकड़ेबाजी के मुताबिक 69,477 नए पंजीकृत हुए और 51,631 ने साक्षरता परीक्षा दी। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि इन्हें पढ़ाने के लिए नियुक्त प्रेरक पढ़ा ही नहीं रहे, ऐसे में समझा जा सकता है कि परीक्षा में बैठे निरक्षकों को कितना पढ़ाया गया होगा। 
 पांच साल से नहीं मिली ग्रांट 
 वर्ष 2011 से प्रदेश सरकार ने योजना के लिए ग्रांट नहीं भेजी है। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2009 में शुरू की गई इस योजना के लिए केंद्र को 60 फीसद और प्रदेश सरकार को 40 फीसद बजट देना है। केंद्र सरकार लगातार अपने हिस्से का बजट योजना के लिए रिलीज कर रही है, पर प्रदेश सरकार के रुपया न देने से न तो किताबें ही जिले को समय पर मुहैया हो पा रही हैं न ही प्रेरकों का मानदेय दिया जा रहा है। प्रेरक एकता संगठन की जिलाध्यक्ष कहती हैं कि आर्थिक तंगी के बाद भी वे सभी ग्राम पंचायतों पर बने लोक शिक्षा केंद्रों पर लगातार पढ़ा रहे हैं पर उनकी  समस्या कोई नहीं सुन रहा। बीएसए ऐश्वर्य लक्ष्मी का कहना है कि प्रेरकों के मानदेय के लिए कुछ बजट प्राप्त हो गया है, कागजी कार्रवाई चल रही है, जल्द ही इसे रिलीज किया जाएगा। 
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बजट में हुआ घोटाला  
वर्ष 2015-16 में साक्षर भारत मिशन योजना में एक बड़ा घोटाला हुआ। योजना के जिला समन्वयक सिकंदर खान पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी पंजीकरण कराए और साक्षरता के लिए आए बजट को हड़प कर फरार हो गया। इसकी जांच  जा रही है। बीएसए एश्वर्य लक्ष्मी कहती है उन्हें इस प्रकरण की अभी जानकारी नहीं है। हालांकि अभी ऐसी कोई जांच आख्या मेरे पास नहीं आई है। आगे जानकारी करके बताऊंगी- 
 बहेड़ी में सबसे ज्यादा अंगूठा छाप
 बरेली की 64.74 फीसद जनसंख्या ग्रामीण इलाके में रहती है, जिसकी कुल साक्षरता 55.89 फीसद है। इसमें 66.68 फीसद पुरुष साक्षर हैं जबकि महिला साक्षरता दर सिर्फ 43.59 फीसद है। शहरी क्षेत्र में कुल आबादी के 35.26 फीसद लोग रहते हैं। जिसमें महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 56.46 फीसद जबकि पुरुष की साक्षरता दर 68.95 फीसद है। कुल साक्षरता दर 63.05 फीसद है। ब्लॉक स्तर पर बहेड़ी में इस समय सबसे ज्यादा कुल 10600 निरक्षर हैं, सबसे कम निरक्षरों की संख्या क्यारा ब्लॉक में कुल 5005 है। 65 साल की गंगादेई से सीखिए
भोजीपुरा ब्लॉक के आसपुर-पीतमराय गांव की 65 साल की गंगादेई नव साक्षरों में से एक हैं उनकी तमन्ना है कि वह इतना सीख लें कि बड़ी कक्षा की किताबें भी पढ़ सकें। साकार संस्था साक्षरता केंद्र में पढ़ी गंगादेई फिलहाल अपने पोता-पोतियों का साथ पढ़ती हैं।
गंगादेई के पति का देहांत हुए 25 साल हो चुके हैं, घर में चार शादीशुदा बेटों का परिवार है। दो साल पहले तक  जिंदगी  नाती-पोतों को कहानियां सुनाते गुजर रही थी, लेकिन साक्षरता केंद्र में पढ़ने के बाद अब ये पोता-पोती संग बैठकर पढ़ती हैं।  कहती हैं- ‘पढ़न में बड़ौ अच्छौ लगत है, हम तो बस्ता टांग के सेंटर पर पढ़न जात हैं। सुरू मै तो नाती-पोता हंसी बनाओ करत हे, अब तो जब जे सब बच्चा पढ़न बैठत है, तो हम भी अपनी कापी निकाल कै पढ़ लेत है।’
 साक्षरता केंद्र की शिक्षिका मीरा कहती हैं कि उम्रदराज राम देई का पढ़ाई के प्रति ये जज्बा सबको हैरान कर देता है। गंगादेई ने खुद फार्म भर कर वृद्धावस्था पेंशन के लिए आवेदन किया और अब पेंशन ले रही हैं। 
 बड़ा रोल निभा रहा मोबाइल
मोबाइल क्रांति महिला साक्षरता में बड़ा आयाम लेकर आई है।  कालीबाड़ी पर रह रहीं हाउस वाइफ सुनीता कहती हैं कि मोबाइल और व्हाट्सएप, फेसबुक के कारण हमें तकनीकी साक्षरता मिली है। इंग्लिश में टाइप करना सीखा है। एक अन्य महिला राधिका बताती हैं कि उन्हें अग्रेजी भाषा सीखने का शौक था  जब से उनके पास मोबाइल पर इंटरनेट आया है, उन्होंने इंग्लिश लर्निंग वेबसाइट पर जाकर पढ़ना शुरू कर दिया है। 
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