बरेली। गुलामी की बेड़ियों से देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजमोहन लाल शास्त्री की प्रतिमा लगवाने के लिए परिजन को तीन लाख रुपये खर्च करने पड़े। तब मोती पार्क में प्रतिमा स्थापित हो सकी। नेता-अफसर सिर्फ दावे तक सीमित रहे।
बड़ा बाजार मिरधान गली निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजमोहन लाल शास्त्री के पौत्र अनिल कुमार शास्त्री के पिता ओंकारनाथ शास्त्री भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। अनिल के मुताबिक, पिता की अंतिम इच्छा थी कि शहर में दादा की प्रतिमा लगे। शासन, प्रशासन, नेताओं को पत्र भेजे पर कुछ न हुआ। पिता की अधूरी इच्छा को पूरी कराने के लिए अनिल ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अधिकारियों के चक्कर काटे। वर्ष 2021 में तत्कालीन सांसद संतोष गंगवार के प्रयास से कोहाड़ापीर स्थित मोती पार्क में प्रतिमा लगाने की मंजूरी मिली, पर बजट का अड़ंगा आ गया। तब अनिल को तीन लाख रुपये खर्च कर प्रतिमा की स्थापना करानी पड़ी। कहा कि प्रतिवर्ष पुण्यतिथि पर सामूहिक भंडारा कर रहे हैं।
देश को आजाद कराने में समर्पित रहीं परिवार की तीन पीढि़यां
अनिल के मुताबिक परदादा रामभजन लाल भी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे। उनकी प्रेरणा से दादा और फिर पिता भी देश को आजाद कराने के लिए जुटे रहे। सभी कई बार जेल गए। अंग्रेजों के जुल्म के बावजूद वे टूटे नहीं। दादा बृजमोहन लाल शास्त्री के सेठ दामोदर स्वरूप, आचार्य नरेंद्र देव, लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, खान अब्दुल गफ्फार खान, रफी अहमद किदवई से घनिष्ठ मित्रता थी। वह भारत छोड़ो आंदोलन, लाहौर अधिवेशन, कलकत्ता सम्मेलन में भी शामिल हुए थे। अमर उजाला ब्यूरो