सुरक्षा बोध से त्रस्त व्यक्ति ने पूरी पार्टी पर कब्जा कर लिया
अन्ना के आंदोलन से निकलकर सीधे दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे अपने पुराने साथी अरविंद केजरीवाल के नाम पर कुमार विश्वास तल्ख होने लगते हैं। सीधे उनका नाम नहीं लेते, लेकिन कहते हैं कि सुरक्षा बोध से त्रस्त एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी पर कब्जा कर आंदोलन को निष्फल कर दिया। राजनीति को 2011 के उसी दौर में ले आया गया जहां से हम लोग उसे खींचखाच कर भ्रष्टाचार मुक्ति, पारदर्शिता और राजनेताओं की अहंकारशून्यता पर लेकर आए थे। चंदे में पारदर्शिता की बात की थी, लेकिन अब तो हमारी पार्टी का ही नेता कहता है कि चंदे का हिसाब नहीं दूंगा। लोकायुक्त को नहीं बताऊंगा कि कि कितना कमा लिया है। दूसरे नेता तो हैं ही ऐसे, उनका तो कहना ही क्या है।
जनता ज्यादा उम्मीद न करे, देश में कोई मुद्दा नहीं
देश के बड़े मुद्दों के सवाल पर कुमार विश्वास कहते हैं कि देश में फिलहाल कोई मुद्दा ही नहीं है। साढ़े चार साल बाद जिन्होंने सरकार चलाई उनके पास सिर्फ यह मुद्दा है कि नेहरू ने क्या किया था। कोई मुद्दा न होना, यही राजनेताओं की सफलता है। राजनीति में भरोसे का संकट हमेशा रहा है। गठबंधन की सरकारों में खूब ऐसा हुआ है। यूपी में लोगों ने कभी मुलायम को वोट दिया कभी मायावती को। 70 सालों से जिस देश की राजनीति जाति के समीकरणों से ऊपर न उठी हो, जहां पॉलिटीशियन की इस तरह की लॉबी और सेटअप हो, वहां इसके अलावा क्या उम्मीद कर सकते हैं।
साहित्य का हाल राजनीति जैसा नहीं
साहित्य का हाल राजनीति जैसा तो नहीं है। लेकिन प्रमाणिकता का खतरा तो हर तरफ है, चाहे वह राजनीति हो, साहित्य हो या फिर पत्रकारिता। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कला-संस्कृति, भाषा और पत्रकारिता अपनी राह ढूंढ ही लेते हैं।
राजनीति न पकड़ी थी न छोड़ी है
राजनीति से क्या किनारा कर लिया, इस सवाल पर कुमार विश्वास कहते हैं कि राजनीति तो युगधर्म है, उन्होंने न पकड़ी थी न छोड़ी है, अभी पूरी तरह सब समाप्त नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव में क्या रुख होगा, इस सवाल पर कहते हैं, अभी यह सवाल बहुत अर्ली है। यह भी बोले कि फिलहाल बहुत निर्भार महसूस कर रहा हूं। उन्हें सरकारी सम्मान नहीं मिला, सरकारें उन्हें बुलाती नहीं। मगर कोई कमी नहीं है। टैक्स भी बहुत ज्यादा देते हैं। पिछले सत्र में 1.27 लाख टैक्स दिया था। यह परम निर्भार होने की अवस्था है।
अमर उजाला में छपा था मेरे पिता जी का लेख
कुमार विश्वास ने बातचीत के दौरान 1977 का वो दौर भी याद किया, जब अमर उजाला में उनके पिता जी का लेख छपा था ‘औरंगजेब बनाम इंदिरा गांधी’। उन्होंने बताया कि उस दौर में अमर उजाला के पास संसाधनों की इतनी कमी होती थी कि मोमबत्तियों की रोशनी में खबरें लिखी जाती थीं। अमर उजाला में इंदिरा गांधी के खिलाफ लेख छपने के बाद उनके पिताजी गिरफ्तार हो गए थे। बोले, वो दौर ऐसा था जब एक छोटी सी खबर छपने पर भी बड़ी कार्रवाई हो जाती थी।