मुआवजा बंटने और लगातार सर्वे के बीच भी किसानों के दम तोड़ने का सिलसिला थम नहीं रहा है। सोमवार को चार और किसानों की मौत हो गई। हालांकि घर वालों ने बर्बाद फसल देख सदमा लगने और सर्वे न होने की बात कही है। मरने में वालों में बहेड़ी के दो, फरीदपुर और मीरगंज तहसील के एक-एक किसान शामिल हैं।
फोटो
पहले कर्ज ने मारा और अब फसल ने
भुता। डीएम के गोद लिए लोहिया समग्र गांव भवनपुर नियामतुल्ला में 58 वर्षीय किसान राम बहादुर कश्यप की मौत हो गई। सुबह अचानक तबियत बिगड़ने पर उसने रविवार रात घर में ही दम तोड़ दिया। राम बहादुर पहले से ही कर्ज में डूबा था। अब दस बीघा फसल की बर्बादी से वह टूट गया था। पत्नी सावित्री ने बताया कि अस्सी हजार रुपये सूद पर लेकर खाद और पानी का इंतजाम किया था। कुछ कर्ज बीमारी में लिया था। 20 वर्षीय लड़की की शादी की चिंता भी सता रही थी। एक बेटा बरेली में रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा है। प्रधान मो. जफर ने कहा है कि सर्वे के बाद भी राजस्व कर्मी यहां मुआवजा बांटने नहीं आ रहे हैं। जबकि गांव को खुद डीएम ने गोद लिया है।
....................
फोटो
रिछा के भोगपुर में दो किसानों की मौत
रिछा। भोगपुर में एक साथ दो किसानों की जान जाने से गांव में कोहराम मचा है। 50 साल के राममूर्ति लाल सोमवार दोपहर खेत में गए थे। पांच बीघा जमीन में बोई गेहूं की फसल के बर्बाद होने से वह परेशान थे। दाना न निकलने पर वह खेत में ही गश खाकर गिर गए। अस्पताल ले जाने पर उन्होंने दम तोड़ दिया। उन्होंने सूदखोरों से हजारों का कर्ज ले रखा था। शाम को इसी गांव के 65 साल के डोरी लाल की मौत की भी खबर आ गई। उन्हें आंगन में पड़ी चारपाई पर सोते समय हार्टअटैक पड़ गया। घर वालों ने बताया कि उनकी दस बीघा फसल बर्बाद हो गई थी।
..........................
फोटो
20एमआरजेडपी4-नन्हे जाटव का फाइल फोटो
खेत में गिरा और उठ न सका
दुनका। आनंदपुर गांव के 45 वर्षीय किसान नन्हें जाटव की रविवार को गेहूं के पूले बांधते वक्त जीरा जैसे दाने और कम पैदावार देखकर हालत बिगड़ गई। रात को उन्होंने दम तोड़ दिया। तीन भाइयों में दूसरे नंबर के नन्हें सिर्फ ढाई बीघा जमीन के जोतदार हैं। उनके चार बच्चों में सबसे बड़ा गुड्डू सिर्फ 16 साल का है। छोटा बेटा पवन 12, बेटी कामिनी 10 और रेखा सात साल की हैं। गांव वालों से उन्होंने 25 हजार कर्ज भी ले रखा है। गांव वालों ने बताया कि परिवार में दो वक्त खाने का जुगाड़ भी मुश्किल से ही हो पाता था।