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हम तो लुट गए, फसल गई मुआवजा भी नहीं मिलेगा

Tue, 14 Apr 2015 02:14 AM IST
बरेली
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बारिश और ओलावृष्टि की सबसे ज्यादा मार ठेके या बटाई पर खेती करने वाले किसानों पर पड़ी है। खेतों में लहलहाती फसल देख उन्होंने जो सपने देखे थे, वे टूट गए हैं। सर्वे के दायरे में उनकी फसल तो आ रही है मगर वे मुआवजे के हकदार नहीं हैं। किसी को बिटिया के हाथ पीले करने हैं तो किसी को कर्ज चुकाना है। गेहूं के बजाय जीरा जैसा काला दाना हाथ में आने से दो जून की रोटी का बंदोबस्त करना तक मुश्किल हो गया है। एक ओर उन्हें खेत मालिक तय अनाज के लिए तंग कर रहा है तो दूसरी ओर कर्ज देने वाला महाजन भी घर के चक्कर काटने लगा है। अमर उजाला ने सोमवार को ऐसे ही किसानों की पीड़ा को नजदीक से जाना-
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खेती संग मारी गई उम्मीदों की फसल  
मीरगंज। मनकरा गांव के कैलाश चंद्र कश्यप भूमिहीन हैं। एक क्विंटल बीघा छमाही की दर से 35 बीघा जमीन ठेके पर ली थी। साहूकार से 30 हजार रुपये कर्जा लेकर चार बीघा में शिवालिक और 31 बीघा में गेहूं बोया था। 20 बीघा गेहूं तो भूसा बनने लायक भी नहीं रहा। 11 बीघा में भी 60 फीसदी तक नुकसान हुआ है। परिवार में पत्नी कितुका देवी, दो बेटे और तीन बेटियां हैं। मुफलिसी इस कदर कि सिर्फ एक बेटी का ब्याह ही बड़ी मुश्किल से कर पाया है। दो जवान बेटियां ब्याहने को बाकी हैं। एक बेटी की शादी इसी साल मई में पक्की कर दी थी। सोचा था कि खेती में पैदावार से जमीन मालिक का हिस्सा निकालने के बाद कुछ रकम जरूर बचेगी। बाकी साहूकार से कर्जा लेकर बिटिया के हाथ पीले करवाने का इंतजाम करेगा, लेकिन बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि खेती के साथ ही उम्मीदों की फसल को भी मार गई है। सरकार मुआवजा भी देगी तो भूमिधर काश्तकारों को ही तो मिलेगा।
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 बहेड़ी
चंद्रपाल और त्रिलोकी का सब कुछ बर्बाद हो गया
बहेड़ी। नैनीताल रोड पर बसे गांव भुडवा के किसान चंद्रपाल ने इस बार करीब बीस बीघा जमीन बंटाई पर लेकर गेहूं बोया था। पत्नी का जेवर महाजन के यहां गिरवी रखकर फसल के इंतजाम में रकम लगा दी। साल भर की मेहनत बर्बाद हो गई है। गेहूं जमीन पर लेट गया। बाली मसली तो कुछ नहीं निकला। कई रोज हो गए चंद्रपाल के घर में चूल्हा नहीं जल रहा है। फि क्र सताए जा रही है कि वह खेत मालिक को तय अनाज कैसे देगा। पत्नी के गिरवी पड़े जेवर छुड़वाने का दबाव भी उसे परेशान कर रहा है।
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यही हाल सिरसा के किसान त्रिलोकी राम का है। पांच बीघा जमीन गांव के एक किसान की बंटाई पर ली थी। बारिश ने सब तबाह कर दिया है। अब खेत मालिक तय किए हुए सवा क्विंटल बीघे की दर से अनाज की मांग कर रहा है। त्रिलोकी बताते हैं कि साहब इस बार तो पशुओं के लिए भूसा भी मुश्किल से मिल पाएगा।
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कैच वर्ड : आंवला
इससे अच्छा तो मजदूरी कर लेते
आंवला। आठ बच्चों के साथ कच्चे घर में गुजर बसर करने वाले गैनी गांव के रामचंद्र की नींद उड़ी हुई है। तीस बीघा जमीन में लगाई गेहूं की फसल के लिए उन्होंने रात देखी न दिन। कंपकंपाती ठंड की भी परवाह नहीं की। रोहित गुप्ता की तीस बीघा जमीन बटाई पर ली थी। सब कुछ बर्बाद हो गया। एक कमरा और बनाने की सोची थी मगर भाग्य में नहीं बंधा था। यही हाल सत्यप्रकाश कश्यप की जमीन बटाई पर करने वाले रामपाल कश्यप का है। वह कहते है कि इस बार शुरुआत में लहलहाती फसल देख ज्यादा ही प्लानिंग कर ली थी। नील गाय से तो फसल को बचा लिया मगर बारिश के आगे जोर नहीं चल सका। कुदरत की मार के आगे सब बिखर गया।18 बीघा फसल में से साल भर के खाने लायक गेहूं नहीं निकला। उन्होंने कहा कि अब लग रहा है कि खेती करने से अच्छा होता मजदूरी कर लेते। कम से कम कर्जदार होने की नौबत तो नहीं आती।
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कैच वर्ड : नवाबगंज
फोटो पी एच 01- मो. इस्लाम की बर्बाद फसल
फसल हमारी बर्बाद, मुआवजा मालिक का
नवाबगंज। नगर के मो. इस्लाम ने बिजौरिया उर्फ नवाबगंज के मुन्ने और इस्माइल आदि से 55 बीघा जमीन ठेके पर ली थी। ओलावृष्टि ने सब चौपट कर दिया। इस्लाम परेशान हैं। कहते हैं, ठेके पर जमीन लेकर फसल करने वाले तो दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं। एक तो फसल बर्बाद हो गई दूसरा मुआवजा भी नहीं मिलेगा। लेखपाल को जमीन की खतौनियां निकलवा कर दे दी हैं। जमीन के मालिक के बैंक खाते नंबर भी दर्ज करा दिए हैं। पता नहीं जमीन मालिक उन्हें मुआवजा की राशि देते हैं या नहीं। उधर, नायब तहसीलदार गोपेश तिवारी ने कहा कि जिस व्यक्ति के नाम जमीन है, मुआवजे की राशि उसके खाते में ही भेजी जा रही है। अब जमीन मालिक और ठेके पर खेती करने वाले ही इस बारे में तय कर सकते हैं।
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