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बर्बादी देखकर माथा थामे बैठे अन्नदाता किसान।

Wed, 08 Apr 2015 01:31 AM IST
बरेली
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पंचायत वीरपुर बकैनिया का मजरा सुल्तानपुर। तहसील क्षेत्र के अन्य गांवों की तरह इस गांव में भी अतिवृष्टि, ओलावृष्टि से तबाह अन्नदाता किसान मुसीबत में हैं। सबसे ज्यादा आफत भूमिहीन बटाईदार, ठेके पर खेती कर गुजर-बसर करने वाले खेतिहर मजदूरों की है। सरकार उन्हें काश्तकार ही नहीं मानती, तो मुआवजा मिलने का सवाल ही कहां उठता है?
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परसादी लाल ने 10 बीघा जमीन बटाई पर और इतनी ही एक क्विंटल बीघा के हिसाब से ठेके पर लेकर गेहूं बोया था। पूरी 20 बीघा फसल बहा ले गई। अब माथा पीटने को मजबूर हैं। परसादी लाल की चिंता यह है कि 20 अप्रैल को बिटिया की बारात आनी है। लाख कोशिश करने पर भी विवाह कार्यक्रम टल नहीं सका तो रिश्तेदारों से डेढ़ क्विंटल गेहूं और 60 हजार रुपया उधार लिया है। शादी की रस्में तो होंगी लेकिन बिटिया के हाथ पीले होने की उमंग और खुशी नदारद है। हरीराम दूसरों के खेतों में मजदूरी कर पत्नी और चार बच्चों का परिवार पालता है। उसने भी 10 बीघा खेत ठेके पर लेकर गेहूं बोया था। पूरी फसल मारी गई है। चूल्हा तक ठंडा पड़ने की नौबत है। घरेलू खर्चों के लिए गांव वालों से छह हजार रुपये उधार लेने पड़े हैं। धर्मपाल ने भी 10 बीघा खेत ठेके पर लेकर गेहूं बोया था। खेत से कुछ मिला नहीं, तो 40 हजार रुपया साहूकार का कर्जा और मोटा सूद कहां से उतरेगा? चंद्रपाल ने 15 बीघा, चेतराम ने आठ बीघा जमीन ठेके पर लेकर गेहूं की खेती की थी। खेत से तो कुछ मिला नहीं, उल्टे चंद्रपाल 17 हजार, चेतराम पांच हजार का कर्जदार बन बैठा है। इन सबका एक ही सवाल था कि हलका लेखपाल ने भले ही दो दिन गांव में सर्वे किया हो लेकिन सरकार मुआवजा देगी भी तो सिर्फ उन्हीं किसानों को जो भूमिधर हैं। पूरी तरह बर्बाद हो चुके हम भूमिहीन किसानों के सामने तो आत्म हत्या के अलावा चारा ही क्या बचा है?
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