बरेली। नौ अगस्त 1925 में काकोरी में ट्रेन लूट की घटना के बाद क्रांतिकारियों को बरेली केंद्रीय कारागार लाया गया। ये क्रांतिकारी थे - मन्मथनाथ गुप्त, शचींद्रनाथ बख्शी, मुकुंदीलाल और राजकुमार सिन्हा।
इतिहासविद और साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी के मुताबिक, मुकुंदीलाल मैनपुरी केस-1918 के पुराने क्रांतिकारी थे। जो पता नहीं क्यों सरकार की आम माफी के बाद भी उस मामले में साढ़े छह साल की सजा पूरी काटकर ही बाहर आए, जबकि दूसरे लोग उस घोषणा के बाद ही रिहा कर दिए गए थे। मुकुंदीलाल अपनी सजा के बाद जैसे ही छूटे, क्रांतिकारी नेता राम प्रसाद बिस्मिल उन्हें काकोरी के ऐक्शन में ले गए। इसमें उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। उन्होंने यह भी बताया कि बरेली केंद्रीय कारागार में पहुंचे काकोरी के इन क्रांतिकारियों ने राजनीतिक बंदी का दर्जा पाने के लिए यहां लंबी भूख हड़ताल की। इसे तब भगत सिंह ने भी लाहौर जेल से अपना समर्थन संदेश भेजा था। सुधीर विद्यार्थी ने बताया कि क्रांतिकारी अपने इस मुश्किल संघर्ष के प्रति इतने दृढ़ थे कि एक बार मन्मथनाथ गुप्त ने जेल से बाहर अपने साथियों को यह संदेश भेज दिया था कि साथियों को अब उनकी भूख हड़ताल खत्म कराने की फिक्र न कर, उनकी लाशों का बंदोबस्त करना चाहिए। अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा समर्पण था इन क्रांतिकारियों का।
उनका यह भी कहना है कि काकोरी के क्रांतिकारियों का योगदान सिर्फ राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी की फांसी ही नहीं मान लिया जाना चाहिए। बल्कि उससे आगे बढ़कर जेल के अंदर उनका इतना लंबा संघर्ष और हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के विचारपूर्ण लक्ष्य को रेखांकित किया जाना मुझे जरूरी लगता है। काकोरी की घटना ने ही देश का ध्यान असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य से संग्राम की ओर मोड़ा।
सुधीर विद्यार्थी एक घटना बताते हुए कहते हैं, मन्मथनाथ गुप्त जब जनवरी 1928 में केंद्रीय कारागार बरेली पहुंचे तो यहां पहले से ही बंद काकोरी के कैदी राजकुमार सिन्हा और मुकुंदीलाल अपने अधिकारों के लिए भूख हड़ताल पर थे। क्रांतिकारियों ने हवालात में ही तय कर लिया था कि जो जिस जेल में भेजा जाए, वह वहां अपने अधिकारियों के लिए अनशन करेगा। भूख हड़ताल की वजह से राजकुमार सिन्हा और मुकुंदीलाल की हालत बहुत जल्दी खराब हो गई। मुकुंदीलाल ने 32वें दिन और राजकुमार ने 38वें दिन बाद अनशन तोड़ा। इतनी लंबी भूख हड़ताल अपने आप रिकॉर्ड है।