जरी के नाम पर बरेली के अफसरों ने स्मार्ट सिटी का तमगा हासिल कर लिया। पर गरीब अनपढ़ लेकिन हुनरमंद कारीगरों की हालत को सुधार की बहुत जरूरत है। ये कारीगर किसी मेगा क्लस्टर या उनके कल्याण के लिए आए कई सौ करोड़ की सरकारी इमदाद से बेखबर हैं। बस इतना जानते हैं कि नई सरकार में उनकी रोज की रोटी भी तिहाई रह गई है। कैश और उधारी पर चलने वाली जरी की अर्थ व्यवस्था को नोटबंदी और जीएसटी ने बहुत नुकसान पहुंचाया। बड़े कारोबारी भी सरकारी के इन कदमों पर रोए पर इन कारीगरों से तो इन दिनों में तिहाई मेहनताने पर ज्यादा काम कराया जा रहा है। ये दिन कब बहोरेंगे, कारीगर बस अल्लाह से इतनी दुआ मना रहे हैं। कई तो ऐसे हैं कि जिंदगी के बीस-तीस साल इस काम में शरीर धुनने और गिर चुकी आंखों की रोशनी में दूसरा रोजगार ढूंढ रहे हैं। कई ने ईरिक्शा चलाना शुरू कर दिया है। रबड़ी टोला की 12 दुकानों की मार्केट में नौ दुकानों के शटर अब नहीं उठते। पढ़िए जरी दरजोदी के शहर की हुनरमंदों का हाल।
मेहनताना रह गया अस्सी रुपया, मुस्लिम महिलाओं पर मार
बरेली। सूफी टोला के राहत नूरी (51) साल बताते हैं कि चार साल में रकम घटकर तिहाई रह गई है, बोले- अब नफरी (आठ घंटे का काम) अब अस्सी रुपये है। बहुत बढ़िया कारीगर को ठेकेदार 120 रुपये तक दे देता है। आमतौर पर कारीगर डेढ़ नफरी (11 घंटे) ही कर पाता है। मुस्लिम महिलाओं का हाल बहुत खस्ता है, पुराना शहर के किसी इलाके में घूम आइए, घरों में लगे अड्डे खाली मिलेंगे। जहां कहीं भी महिलाएं काम करती मिलीं, बोलीं- अव्वल तो काम नहीं आ रहा, ठेकेदार काम देता भी है तो सस्ते मद्दे दाम पर। कई घरों में आदमी काम नहीं करते, घर महिलाएं और बच्चों के जरी की मेहनत से चलता था, अब दो समय की रोटी जोड़ना मुश्किल है। नोटबंदी में बड़े कारोबारियों ने कारीगरों को खूब छला, मद्दे दाम पर उनसे ज्यादा काम लिया गया, स्थिति अब भी लगभग वैसी है।
उधार के काम में जेब से कब तक दें जीएसटी, छोड़ दिया काम
बरेली। बीस लाख से कम पूंजी के दुकानदार जीएसटी से बाहर हैं पर दुकानदारों का कहना है कि गांव-देहात से कट्टे में पचास-सौ पीस लाने पर भी पुलिस वाले रोककर जीएसटी नंबर दिखाने के नाम पर वसूली करते हैं। कई छोटे दुकानदार इसलिए काम छोड़ चुके हैं। पुराना शहर के मुफ्फर बोले, कारोबार में मुनाफे की उम्मीद से उन्होंने जीएसटी पंजीकरण करा लिया, माल बिक नहीं रहा, जो खाली हुआ है वह उधार पर। अपनी जेब से टैक्स कहां तक दूं, इसलिए काम बंद है। दुकानदार मो. उस्मान सकलैनी ने कहा कि हम जीएसटी दे रहे हैं, कपड़े पर जीएसटी से इतनी दिक्कत नहीं है, हैंडीक्राफ्ट पर जीएसटी हटनी चाहिए। क्योंकि कारीगरी का पूरा काम उधारी पर चलता है। बोले, हमारे यहां आने वाले छोटे दुकानदारों को चेक देने हैं, उनका टीडीएस कटेगा, इसके लिए उन्हें रिटर्न फाइल करना आना चाहिए, अनपढ़ दुकानदार सीए के पास जाकर रुपया खर्च करे, लोग बहुत परेशान हैं और काम छोड़ रहे हैं। कई ने ईरिक्शा चलाना, परचून की दुकान खोल ली है। रबड़ी टोला और सैलानी में जरी के रिजेक्ट माल की दुकानों में कई बंद हो चुकी हैं। 50 साल से काम कर रहे दुकानदार युसुफ भाई बोले, हम तो इस फिराक में हैं कि कोई नया काम मिल जाए कि बुढ़ापा काट सकें।
बड़े कारोबारियों का काम भी प्रभावित
बरेली। बरेली का माल विदेश में निर्यात होता था, पर आर्थिक मंदी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब जरी के काम मांग बहुत घटी है। जरी कारोबारी गोपाल अग्रवाल बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंदी और एफडीआई के बाद से स्थिति खराब हुई है। इस दौरान सरकार ने कभी जरी कारीगरों पर ध्यान नहीं दिया, उस पर भी नोटबंदी और जीएसटी लगा दी, जिसने कमर तोड़ने का काम किया है। बोले, लखनऊ के रेशम कारोबार पर असर नहीं पड़ा है क्योंकि वह कैजुअल वेयर में भी इस्तेमाल होता है, जरी पार्टी वेयर ड्रेस होने से भी फर्क पड़ा है, लोगों की खरीदने की क्षमता घटी है।
कौन से दो लाख कारीगरों की आईडी बनवा रहा है विभाग
बरेली। मार्च 2014 में शुरू हुई बरेली हैंडीक्राफ्ट मेगा क्लस्टर मिशन के प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर खुर्शीद आलम ने बताया कि अब तक करीब दो लाख कारीगर जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि कारीगरों को स्कीम के तहत देशभर में होने वाले क्राफ्ट मेलों में दुकान लगाने को मिल रही है, स्वास्थ्य बीमा मिला है। शहर में छह एनजीओ काम कर रहे हैं जिनका काम जरी और हैंडक्राफ्ट कारीगरों को स्कीम से जोड़ना है। योजना का कार्ड बनने के बाद कारीगर को शहर में बने सामान्य सुविधा केंद्र में काम करने का अवसर मिलता है। सुविधा केंद्रों का संचालन कर रहे एनजीओ को सरकारी सिलाई मशीन और अड्डे मिले हैं। यहां काम करने वाले कारीगर को तीन सौ रुपये मेहनताना मिलता है। एनजीओ चला रहीं कई पुरस्कार प्राप्त शालू बताती हैं कि मेगा क्लस्टर के बाद जरी उद्योग फलाफूला है, मुस्लिम कारीगर के अलावा भी लोग जुड़े हैं। पर शहर के पारंपरिक जरी कारीगरों से जब जिला उद्योग विभाग और योजना के तहत मिलने वाली आईडी के बारे में पूछा तो किसी को भी इसकी जानकारी नहंी थी।