भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर में आयोजित उत्तर क्षेत्रीय आंचलिक कृषि मेले में सम्मानित प्रगतिशील किसानों ने कड़ी मेहनत से खेतों को लहलहा दिया है। फिरोजाबाद के शेरसिंह यादव ने ऑर्गनिक खेती को बढ़ावा देकर दूसरे किसानों को भी खुशहाल बनाने में भूमिका निभाई है। अंबाला के हरविंदर सिंह ने तकनीकी के इस्तेमाल से गन्ने के साथ दूसरी फसलें भी करके मल्टी फार्मिंग को बढ़ाया दिया है और हिमाचल प्रदेश के ऊना के अतुल ने अपने बगीचे को मॉडल बनाकर कीर्तिमान गढ़ा है। वहीं, सहारनपुर के सेठपाल सिंह ने सब्जी की खेती में कीर्तिमान गढ़े हैं।
शेरसिंह यादव
2009 में आर्मी में सूबेदार के पद से रिटायर होने के बाद इन्होंने 2010 में फिरोजाबाद जिले के मातेश्वरी गांव में अपनी एक हेक्टेयर जमीन पर नए तरीके से खेती की ठानी। 2010 में 10 लाख का लोन लिया और बर्मी कंपोस्ट का प्लांट डाला। उन्होंने बताया कि बर्मी कंपोस्ट से खेतों में रासायनिक खाद की अपेक्षा कम लागत से कई फसलें उपजाई। बंजर भूमि को उपजाऊ भी बनाया। उनके बर्मी कंपोस्ट के प्लांट ने आसपास के किसानों को कम कीमत पर खाद मुहैया कराई है। इससे खेती पर लागत कम और मुनाफा ज्यादा हुआ। आज उनके प्लांट पर एक हजार टन बर्मी कंपोस्ट हर साल तैयार होता है। इस पर इलाके के बहुत सारे किसान निर्भर हैं। उनके इस प्रयास की वजह से ही उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें श्रेष्ठ किसान के रूप में चुनकर गुजरात भेजा था। गुजरात सरकार ने उनको 51 हजार रुपये का इनाम दिया था। शेर सिंह कहते हैं कि अगर छोटे किसान भी सूझबूझ से काम करें तो वह खुशहाल हो सकते हैं।
सेठ पाल सिंह
सहारनपुर जिले के फिरोजपुर में इन्होंने अपने छह भाइयों के साथ मिलकर साझे की 10 हेक्टेयर भूमि पर 15 साल पहले कृषि कार्य शुरू किया। सब्जी उगाई। अमरूद और आम का बगीचा भी लगाया है। गेहूं, धान की फसलें भी करते हैं। नए उपायों को अपनाकर खेती से ज्यादा उपज हासिल की। एक फीट पानी में सिंघाड़ा लगाया है और उसमें मछली पालन भी कर रहे हैं। उन्होंने अपने फार्म हाउस को एग्रीकल्चर पर्यटन के लिए खोल रखा है। वह बताते हैं कि खेती अगर सूझबूझ से की जाए तो उससे बेहतर न तो नौकरी है और न ही अन्य कोई व्यवसाय। वह दूसरे किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि किसानों को सिर्फ एक खेती पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। अपने खेतों में कई प्रकार की फसलें उगानी चाहिए।
हरविंदर सिंह
हरियाणा के अंबाला जिले के सपाड़ा गांव में अपनी एक एकड़ जमीन पर पांच साल पहले हरविंदर ने नई तकनीकी से खेती करने की ठानी और लोन लेकर डीएसआर तकनीकी पर आधारित मशीन खरीदी। इसके जरिए उन्होंने अपने खेत में परंपरागत तरीके के बजाय सीधे धान की फसल रोपी। नतीजा, मजदूरों की जरूरत खत्म हुई और उत्पादन भी बढ़ा। इसी तरह गन्ने की फसल के बीच में दाल, लहसुन और प्याज जैसी दूसरी फसलें भी बोईं। इससे कम जमीन पर दोहरा लाभ मिला। दो साल पहले उनको हरियाणा सरकार ने सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में सम्मानित किया। हरविंदर ने बताया कि उनकी प्रेरणा पर बाकी किसानों ने भी कृषि की आधुनिक तकनीकों को अपनाया। उनका कहना है कि किसानों को परंपरागत तरीकों से हटकर खेती करनी चाहिए।
अतुल
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के चढ़तगढ़ गांव के अतुल के पास 10 साल पहले सवा एकड़ में आम का बगीचा था। पेड़ों के बीच खेती का उन्हें ऐसा जुनून सवार हुआ कि नौकरी छोड़कर उसमें पहले फूलों की खेती शुरू की फिर वहीं मशरूम भी उगाई और डेयरी प्लांट भी खेल दिया। उनका बगीचा मल्टी परपज हो गया। महीने की आमदनी ही लाखों में पहुंच गई। छह साल पहले हिमाचल प्रदेश सरकार ने उनको वेस्ट फार्मिंग अवार्ड प्रदान किया। वह कहते हैं कि सफलता के लिए हर काम को अलग तरीका से करने की जरूरत होती है। यही प्रयोग उन्होंने खेती में किया। उनके पास बगीचे के अलावा और जमीन नहीं थी। सोचा क्यों न बगीचे की जमीन पर ही खेती की जाए और उसमें बहुत कामयाबी मिली।