बरेली। यह फैक्ट्री लगभग पांच हजार कर्मचारियों के परिवारों का भरणपोषण करती थी। रबर फैक्ट्री मजदूर संघ के अध्यक्ष प्यारेलाल प्रजापति बताते हैं कि कम से कम पांच सौ लोगों की आकस्मिक मौत हो गई। इनमें से कई ने आत्महत्या कर ली। बहुत सारे कर्मचारियों और उनके परिवार के लोगों को रोजीरोटी के लिए दूसरे साधन अपनाने पड़े। कई परिवारों के बच्चों की पढ़ाई छूट गई और कई लड़कियों के हाथ पीले होने से रह गया। इस त्रासदी को कर्मचारी भुला नहीं सके हैं। वह इस उम्मीद में जी रहे हैं कि शायद कभी फैक्ट्री फिर शुरू हो जाए या फिर उनका वेतन मिल जाए लेकिन फैक्ट्री मालिकान ने इसे फिर चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
1760 एकड़ जमीन पड़ी है बेकार
फतेहगंज पश्चिमी की सिंथेटिक एंड केमिकल्स फैक्ट्री एशिया की सबसे बड़े और नामी उद्योगों में शुमार हुआ करती थी। इसे वर्ष 1957 में 1760 एकड़ जमीन पर सेठ किलाचंद ने स्थापित किया था और 1962 में यहां प्लांट चालू हुआ। इसके लिए अधिकांश जमीन बहुत कम कीमत पर किसानों से खरीदी गई थी। बाकी जगह लीज पर ली गई। इसमें कार्यरत रहे कर्मचारी बताते हैं कि 15 जुलाई 1999 तक यह हर साल 14 करोड़ रुपये का लाभ देती थी।
कर्मचारियों का साढ़े तीन सौ करोड़ बकाया है
प्यारेलाल प्रजापति बताते हैं कि वर्ष 2000 में कर्मचारियों का लगभग सौ करोड़ रुपये बकाया निकला था। 2010 में वेतन लगभग 266 करोड़ बना और अब लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये वेतन मद का बकाया होने का अनुमान है। कर्मचारी चाहते हैं कि प्रबंधन के वायदे के मुताबिक सारे कर्मचारियों को अब तक के वेतन का भुगतान हो जाए और फैक्ट्री फिर से चलने लगे। अगर रबर फैक्ट्री न भी चले तो यहां कोई और उद्योग धंधा लगाकर जमीन के उपयोग का रास्ता निकाला जाए ताकि बहुत सारे लोगों को रोजगार भी मिल सके।
संतोष गंगवार बस एक बार बोले
कर्मचारियों ने इंसाफ के लिए लंबा आंदोलन किया लेकिन नतीजा कुछ नहीं हुआ। बड़े-बड़े नेताओं ने आश्वासन भर दिए। खूब वायदे हुए लेकिन सारे प्रयास विफल रहे। फैक्ट्री जब बंद हुई थी तो भले ही केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी पर बरेली के सांसद संतोष गंगवार थे। फैक्ट्री बंद होने के तीन महीने बाद भाजपा के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी और गंगवार मंत्री बने लेकिन अपनी सरकार में भी वह इसकेे लिए कुछ नहीं कर सके, यह बात कर्मचारियों को चुभती है। संतोष गंगवार ने इसे लिए सिर्फ एक बार संसद मेें प्रयास किए- 2006 में सवाल उठाकर औपचारिकता भर निभा दी थी।तब से अब तक वह इस मामले को उठाने में नाकामयाब रहे।
क्या है समाधान
रबर फैक्ट्री के मालिकान ने बैंक से कर्ज लिया था। उसके भुगतान के लिए बैंक की ओर से महाराष्ट्र हाईकोर्ट से रिसीवर बैठाया गया। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि अगर बैंक का पैसा मालिकान से भुगतान कराया जाए और उसके बाद फैक्ट्री चालू कराकर कर्मचारियों का भुगतान करा दिया जाए। अगर मालिकान इसके लिए तैयार नहीं हैं तो सरकार को कोई रास्ता निकालने की पहल करनी चाहिए तो फैक्ट्री शुरू होना असंभव नहीं है। बंदी की वजह से फैक्टी का काफी नुकसान हो चुका है। यहां का बहुत सारा सामान चोरी हो चुका है।