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इस्मत जैसी लिखती थीं, वैसे ही दिखती थीं : डॉ. ब्रजेश्वर

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बरेली। राजकमल प्रकाशन की ओर से विंडरमेयर थिएटर में आयोजित पांच दिवसीय किताब उत्सव का तीसरा दिन साहित्य, इतिहास और रंगमंच के संगम के रूप में यादगार रहा। दिनभर चले सत्रों में विभाजन की स्मृतियों से लेकर रंगमंच के इतिहास और मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई तक अनेक विषयों पर चर्चा हुई। डॉ. ब्रजेश्वर सिंह ने कहा, इस्मत चुगताई की उर्दू अदब में बहुत अहमियत है। वह जैसे लिखती थीं, वैसे ही दिखती थीं- सच्ची, बेबाक और निर्भीक। उन्हें उनके लेखन से ही समझा जा सकता है। पुस्तक प्रदर्शनी भी बदस्तूर जारी रही।
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इस मौके पर ‘इस्मत का शहर बरेली’ विषय पर चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह ने कहा कि इस्मत चुगताई इस्लामिया गर्ल्स इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य रहीं और उनका बरेली से गहरा संबंध रहा है। खालिद जावेद ने बताया कि इस्मत के पति शाहिद लतीफ चंदौसी के थे और उस दौर में उनकी लव मैरिज अपने आप में एक मिसाल थी। आज जिस फीमेल सुप्रीमेसी की बात की जाती है, इस्मत ने उसे बहुत पहले अपने जीवन और लेखन में जी लिया था। उनके साहित्य में मुस्लिम समाज की औरतों की सच्ची आवाज सुनाई देती है। पूर्व में सम्युन खान ने इस्मत चुगताई की मशहूर आत्मकथात्मक कृति ‘कागजी है पैरहन’ से अंशपाठ किया। इस सत्र का संचालन मुशाहिद रफत ने किया।

वंचित समाज को जानने के लिए जरूरी किताब है ‘दातापीर’ : प्रभात सिंह
कथाकार हृषिकेश सुलभ के नवीनतम उपन्यास ‘दातापीर’ पर पाठ-प्रस्तुति दी गई। वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह ने कहा कि हिंदू और मुसलमान साथ रहते हैं, दोस्त हैं, लेकिन एक-दूसरे के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। यह उपन्यास इसी अनजानेपन और उससे उपजी भ्रांतियों की पड़ताल करता है। यह हमें बताता है कि अंधेरा सिर्फ वहां नहीं होता जहां उजाला नहीं होता, बल्कि वहां भी होता है जहां हम देखने की कोशिश नहीं करते। यह रचना अंधेरे में जी रही जिंदगियों के संघर्ष और प्रेम की कहानी है जो हमारे समाज के अनदेखे हिस्सों को उजागर करती है।
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इन किताबों का हुआ लोकार्पण
कार्यक्रम की शुरुआत सुहेल वहीद के यात्रा संस्मरण ‘बॉन : यादों में बसा शहर’ के लोकार्पण से हुई। इस अवसर पर राजेश शर्मा ने लेखक से बात की। कथाकार हृषिकेश सुलभ, राजेश शर्मा और राजकमल प्रकाशन के कार्यकारी निदेशक आमोद महेश्वरी के हाथों पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण हुआ। दूसरे सत्र में बलवंत कौर की किताब ‘स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी’ का लोकार्पण हुआ। अमितेश कुमार ने लेखक से बात की। पुस्तक ‘मंच प्रवेश’ का लोकार्पण हृषिकेश सुलभ, फैसल अलकाजी, प्रभात सिंह, अमितेश कुमार ने किया। रंगकर्मी पप्पू वर्मा ने सुकेश साहनी की कहानी ‘पुल’ की पाठ-प्रस्तुति दी। संवाद

आज के कार्यक्रम
किताब उत्सव के चौथे दिन सुबह 11 बजे से कथाकार हृषिकेश सुलभ के निर्देशन में ‘पाठ, विश्लेषण’ की कार्यशाला होगी। अपराह्न 3:30 बजे से कार्यक्रम शुरू होगा जो चार सत्रों में पूर्ण होगा।
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