सीएम योगी अपनी टीम को आगाह करके गए थे कि अति आत्मविश्वास और आत्ममुग्धता में मत रहना। उन्होंने उदाहरण भी दिया था कि इसके शिकार एक महारथी किस तरह एक वोट से हार गए थे। लगता है कि तब तक तमाम वजहों से असुरक्षा की शिकार भाजपा टीम और उसके प्रत्याशी उमेश गौतम ने इस सबक को बेहद गंभीरता से लिया और जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी, मगर सपा इसी आत्ममुग्धता की शिकार हो गई। पार्षद प्रत्याशियों को गंभीरता से न लेना, निर्दलीय मेयर प्रत्याशियों को हल्के में लेना, जनता से घर-घर जाकर मिलने के बजाय अपने कुछ खास पार्षद प्रत्याशियों और पार्टी नेताओं तक सिमटे रहना, मिलने के आतुर विरोधी नेताओं को कुछ न समझना और पूरे मुस्लिम वोट बैंक को अपनी बपौती मान लेना सपा की सबसे बड़ी गलतफहमी साबित हुई। इसी के उलट इन सारे बिंदुओं पर भाजपा प्रत्याशी ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। अमर उजाला टीम की बूथ-बूथ के आंकड़ों और शहरवासियों के मन टटोलने को लेकर की गई पड़ताल में जीत-हार की यही वजहें सामने आईं हैं।
अति आत्मविश्वास बना सपा की हार की वजह
हार की वजह-1
पार्षद प्रत्याशियों को सपा प्रत्याशी ने हल्के में लिया
सपा प्रत्याशी डॉ. आईएस तोमर ने अपने खास चेलों को छोड़कर बाकी पार्षद प्रत्याशियों को हल्के में लिया। निर्दलीय पार्षद प्रत्याशियों को भी उन्होंने साधने की कोशिश नहीं की। यही वजह रही कि साइकिल के चिन्ह पर चुनाव लड़ने वाले पार्षद प्रत्याशियों ने मेयर के लिए वोट मांगने में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई। उदाहरण के तौर पर रहपुरा चौधरी के कई ऐसे बूथ हैं, जहां से आशिक अहमद सपा के पार्षद जीत गए, लेकिन मेयर पद के लिए वोट कम मिले।
हार की वजह-2
पार्षद जीते पर डॉ. तोमर मुस्लिम इलाकों में कमजोर रहे
नगर निगम के पिछले बोर्ड में 23 मुस्लिम पार्षद थे, लेकिन नए बोर्ड में 28 मुस्लिम पार्षद चुनकर आए हैं, लेकिन मेयर पद पर डॉ. तोमर को वोट नहीं मिल पाया। मुस्लिमों के गढ़ में ही भाजपा का प्रत्याशी जीत गए। उदाहरण के तौर पर वार्ड 30 में स्वालेनगर से सपा के अलीम खां पार्षद चुने गए हैं। यहां के बूथ संख्या 228 पर सपा को 269 और भाजपा को 437 मत मिले। इसी वार्ड के बूथ संख्या 229 पर सपा को 157 मत मिले, जबकि भाजपा के मेयर प्रत्याशी को 314 वोट मिले हैं।
हार की वजह-3
अकेले घूमे, पार्षद प्रत्याशी रहे नजरअंदाज
डॉ. तोमर ने शहर के ज्यादातर इलाके में अकेले घूमकर वोट मांगे। उनके साथ उनके करीबियों की टीम ही रही। पार्षद प्रत्याशियों को डॉ. तोमर ने नजरअंदाज किया। कोई भी पार्षद प्रत्याशी उनसे अपनी डिमांड पूरी करने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाया, लेकिन उनके लिए वोट भी नहीं मांगे। पार्टी के कुछ नेताओं पर ज्यादा भरोसा करना भी डॉ. तोमर को मंहगा पड़ा। वह घरों से ऑफिस तक आकर मुस्लिम वोटों के आंकड़े बताकर जिताते रहे, कहीं वोट मांगने नहीं गए। इसका खामियाजा उन्हें हार के रूप में भुगतना पड़ा।
हार की वजह-4
निर्दलीय मेयर प्रत्याशियों को भी नहीं साधा
डॉ. तोमर ने कांग्रेस और बसपा के प्रत्याशियों को बेहद हल्के में लिया। उनके रणनीतिकारों को अंदाजा यह था कि दोनों दलों के प्रत्याशी बीस हजार वोटों तक सिमट जाएंगे, लेकिन कांग्रेस के अजय शुक्ला ने 21295 और बसपा के मोहम्मद यूसुफ ने 19017 मत पाकर सपा प्रत्याशी का गणित बिगाड़ दिया। रही सही कसर आप के नवनीत अग्रवाल ने 3864 मत पाकर, पीस पार्टी यूनुस डैम्पी ने 2474 मत और आईएमसीके मो. रजा उर्फ लल्ला गद्दी ने 5689 मत पाकर पूरी कर दी। इन्हें भी डॉ. तोमर साध नहीं पाए।
हार की वजह-5
संगठन जुटा पर ग्राउंड वर्क नहीं हुआ
समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. तोमर को जिताने के दावे तो करते रहे, शहर को जोन में भी बांट दिया गया, लेकिन ग्राउंड वर्क किसी ने नहीं किया। पार्टी के सभी नेता एकजुट होकर डॉ. तोमर के लिए वोट मांगने निकलते तो जीत के लिए 13 हजार वोट जुटाना मुश्किल नहीं था। कुछ नेता तो अपना चेहरा दिखाने को ही डॉ. तोमर के लिए मेहनत करना समझ रहे थे। वह अति आत्मविश्वास था कि डॉ. मेयर की जीत पक्की है। इसलिए भी उन्होंने किसी इलाके में वोट मांगने जाने के बजाए चेहरा दिखाकर नंबर बढ़ाने का रास्ता चुना।
हारने का खौफ जीत की वजह बना भाजपा की
जीत का आधार- 1
नाराज हर वर्ग को घर-घर जाकर मनाया
नव निर्वाचित मेयर उमेश गौतम ने टिकट मिलने के बाद नाराज हर नेता को घर-घर जाकर मनाया। वह मेयर पद के टिकट की लाइन में लगे ज्यादातर दावेदारों को मनाने खुद उनके घर पहुंचे और भाजपा की जीत को चुनाव लड़ाने की अपील की। संघ की प्लानिंग के मुताबिक पूरी तरह से साइलेंट वर्क किया गया। मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी के नेता भाजपा की रणनीति को समझ ही नहीं पाया। यही रणनीति उनकी जीत का आधार बनती चली गई। नतीजा यह हुआ कि संघ की रणनीति से उमेश गौतम को कामयाबी मिल गई।
जीत का आधार-2
दूसरे दलों के प्रत्याशियों को भी साधा
सपा अपने ही पार्षद प्रत्याशियों को ठीक से मैनेज नहीं कर पाई, लेकिन उमेश गौतम ने भाजपा के अलावा अन्य दलों और निर्दलीय पार्षदों को भी अपने हुनर से साध लिया। दूसरे दलों के जिन पार्षद प्रत्याशियों से उमेश ने बात की, उनसे अपने लिए वोट डलवाने को कहा। निर्दलीय पार्षद प्रत्याशियों को साधने पर उनका सबसे ज्यादा जोर रहा। कुछ बड़े दलों से चुनाव मैदान में उतरे पार्षद प्रत्याशियों को साधने का उमेश गौतम को लाभ भी मिला।
जीत का आधार-3
मेयर प्रत्याशियोें से भी निकटता बनाए रखी
उमेश गौतम ने मेयर की सीट जीतने के लिए चंद प्रत्याशियों को छोड़कर बाकी से निकटता बनाए रखी। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी थे, जिनके वोट काटने से उन्हें फायदा हुआ, उन्हें गति देने का काम भी किया। निर्दलीय प्रत्याशियों में कई तो अंतिम दिन तक उनके संपर्क में रहे। चुनाव में इसका लाभ भी उन्हें मिला। चार बड़े निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे हैं, जिनके पक्ष में 12 हजार से ज्यादा वोट पड़ गए। इसका सीधा नुकसान सपा प्रत्याशी डॉ. आईएस तोमर को ही हुआ।
जीत का आधार-4
भाजपा प्रत्याशियों के साथ गली-गली घूमे
भाजपा से मेयर बने उमेश गौतम ने टिकट मिलने के बाद से ही पार्षद प्रत्याशियों के साथ घर-घर जाकर वोट मांगना शुरू कर दिया। उमेश के चुनाव के रणनीतिकारों ने मतदान के दिन तक का कार्यक्रम तय कर रखा था। पार्षद प्रत्याशियों के पास भी उसकी लिस्ट थी। इसलिए किसी को पूछने की जरूरत ही नहीं थी कि उमेश गौतम कब किसके वार्ड में पहुंचेंगे। संघ की टीम पहले से ही उस इलाके में पहुंच जाती थी। इसके बाद गली-गली घूमकर वोट मांगने का सिलसिला शुरू होता था।
जीत का आधार-प5
संगठन से लेकर सीएम तक का साथ लिया
उमेश गौतम ने टिकट मिलने से लेकर मतदान के दिन तक संगठन से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ तक का साथ लेने में कामयाबी हासिल की। संगठन के जो नेता नाराज थे, सीएम उन्हें उमेश को जिताने का टारगेट देकर चले गए। इससे उमेश की ताकत दोगुनी हो गई। उन्होंने सीएम के आशीर्वाद और संघ की मदद से ताकत लेकर प्रचार अभियान शुरू किया। युवाओं को उन्होंने बरेली के विकास का सपना दिखाया और कामयाब हो गए।