बरेली में कड़ाके की ठंड से ठिठुर रहे लोगों की सेहत के साथ अब दिगामी सेहत भी बिगड़ने लगी है। मनोचिकित्सक के मुताबिक करीब पखवाड़ा भर से चटख धूप न निकलने से ‘हैप्पी हार्मोन’ का स्राव प्रभावित हो रहा है। लिहाजा, लोग दिमागी रूप से परेशान हैं। जिला अस्पताल में इस रोग की चपेट में आने वालों की तादाद 20 फीसदी बढ़ी है। नकारात्मकता बढ़ने से डिप्रेशन की चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने आदतों में थोड़ा बदलाव कर इस मानसिक समस्या से निजात मिलने का सुझाव दिया है।
जिला अस्पताल मनकक्ष के मनोचिकित्सक डॉ. आशीष के मुताबिक ठंड में शारीरिक क्रियाएं प्रभावित होती हैं। ठंड से बचाव के लिए मांसपेशियां, कोशिकाएं और अन्य नलिकाओं के साथ रक्त प्रवाह की जिम्मेदार वाहिकाओं की गतिविधि बढ़ जाती है। कार्बोहाइड्रेट सामान्य दिनों की अपेक्षा सर्दियों में अधिक बर्न होता है। इससे कार्टिसोल का उत्सर्जन बढ़ता है। इसे निगेटिव हॉर्मोन कहा जाता है। जो डिप्रेशन की वजहों में से एक है। यही वजह है कि जब कार्टिसोल की मात्रा शरीर में बढ़ती है तो तमाम लोग अवसाद ग्रस्त होने लगते हैं।
डॉ. आशीष के मुताबिक जब धूप निकलती है तो शरीर की यह क्रियाएं कम होती हैं। वहीं, धूप कम होने पर या कई दिनों तक न निकलने की स्थिति में दिमाग में सेरेटोनिन हॉर्मोन का सीक्रेशन प्रभावित होता है। जिसे मूड लाइटनिंग हॉर्मोन या हैप्पी हार्मोन के नाम से जाना जाता है। जो दिमाग में न्यूरोट्रांसमीटर की तरह कार्य करता है। इसका स्तर कम होने से व्यक्ति उदास, बेचैन और डिप्रेशन की चपेट में आ सकता है।