बरेली। एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में बृहस्पतिवार को आयकर विभाग की एक टीम ने छापा मारकर कई रिकॉर्ड कब्जे में ले लिए। आयकर विभाग को विश्वविद्यालय में टीडीएस कटौती में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की शिकायतें मिली थीं। टीम ने वित्त अधिकारी कार्यालय में गहन जांच की। आयकर विभाग के सूत्रों के मुताबिक प्रारंभिक जांच-पड़ताल में विश्वविद्यालय में बड़े पैमाने पर टैक्स की हेराफेरी होने के संकेत मिले हैं। टैक्स चोरी में विश्वविद्यालय में कारोबार करने वाली कई बड़ी फर्मों के भी शामिल होने का अंदेशा है।
संयुक्त आयकर आयुक्त वृंदा देसाई के नेतृत्व में आयकर अधिकारी रविंद्र कुमार सिंह, एमएमके अब्बास आदि की टीम बृहस्पतिवार सुबह रुहेलखंड विश्वविद्यालय पहुंची तो परिसर में हड़कंप मच गया। टीम ने वित्त अधिकारी कार्यालय को घेरने के बाद बिल और भुगतान संबंधी दस्तावेज तलब किए। सूत्रों के मुताबिक छानबीन में ज्यादातर दस्तावेज ऐसे मिले जिनसे टैक्स की वसूली की पुष्टि तो हो रही थी लेकिन आयकर विभाग को इसकी अदायगी करने का कोई प्रमाण नहीं था। बता दें कि विश्वविद्यालय की ओर से हर महीने सप्लायर्स और ठेकेदारों को करोड़ों रुपये का भुगतान किया जाता है। इसके अलावा शिक्षकों-शोधकर्ताओं की गतिविधियों पर भी अच्छा-खासा खर्च होता है। नियमानुसार इस पर टीडीएस और वैट आदि देय होता है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों की मिलीभगत से सप्लायर और ठेकेदार बिल की वसूली तो टैक्स समेत करते हैं लेकिन इसकी अदायगी आयकर या वाणिज्य कर विभाग को नहीं की जाती। आयकर विभाग के सूत्रों ने बताया कि वित्त विभाग से तमाम दस्तावेज कब्जे में लिए गए हैं। इनकी छानबीन के बाद वित्त अधिकारी को तलब कर स्थिति स्पष्ट की जाएगी क्याेंकि विश्वविद्यालय के समस्त भुगतान वित्त अधिकारी कार्यालय से ही होते हैं।
वाणिज्य कर हेराफेरी की भी चल रही है जांच
दिल्ली आदि कई शहरों के तमाम सप्लायर विश्वविद्यालय में स्टेशनरी सप्लाई और प्रिंटिंग जैसे कामों का ठेका लेते हैं। दूसरे राज्यों के इन सप्लायराें का यूपी में पंजीकरण तक नहीं है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय बरसो से इन्हें करोड़ों के ऑर्डर देता आ रहा है। ये सप्लायर बिलो में टैक्स को भी शामिल कर वित्त विभाग में जमा करते हैं, लेकिन आपसी साठगांठ के चलते यह टैक्स आयकर विभाग तक नहीं पहुंचता। इसका खुलासा पिछले साल वाणिज्य कर विभाग ने किया था जिसकी जांच अभी भी चल रही है।