पर्यावरण विशेषज्ञों को आशंका, वायुदाब भी हो सकता है प्रभावित
बरेली। कोरोना ने शहर में कई जान लीं, कई लोगों की रोजी-रोटी छीनी और तमाम को अस्पतालों की यातना भरी कैद में रखा मगर एक सौगात भी दी। कोरोना को रोकने के लिए लॉकडाउन शुरू हुआ तो बरेली को देश के टॉप टेन शहरों में दर्ज करा चुका प्रदूषण का स्तर दो ही महीने में इतना नीचे आ गया कि सामान्य से भी आधा रह गया। लोगों को करीब 30 साल बाद स्वच्छ हवा में सांस लेने का मौका मिला लेकिन अनलॉक शुरू होते ही प्रदूषण भी एक बार फिर अनलॉक हो गया। घिसटती विकास परियोजनाओं और ट्रैफिक के धुएं ने एक बार फिर प्रदूषण को सामान्य स्तर से दुगने से भी ऊपर पहुंचा दिया।
अनलॉक- 1 से चार के बीच शहर में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई पर प्रदूषण का स्तर दोगुना से भी ज्यादा रिकॉर्ड किया जा चुुका है। पर्यावरणविद आशंका जता रहे हैं कि यही हाल रहा तो प्रदूषण की रफ्तार आगे और तेज होगी। उनका कहना है कि लॉकडाउन में एक्यूआई 40 तक पहुंच गया था जो अनलॉक- 1 में 80 और उसके बाद दो सौ के पास पहुंच रहा है। इसका सीधा प्रभाव शहर के पर्यावरण पर पड़ता दिखाई दे रहा है। तेजी से दर्ज हुआ बदलाव अब लोगों को प्रभावित कर रहा है।
बता दें कि 22 मार्च से शुरू हुआ लॉकडाउन 17 जून तक लागू रहा था। तीन महीने के लॉकडाउन में सभी निर्माण कार्य, उद्योग, कल कारखाने, ट्रैफिक और बाजार सब कुछ बंद रहा। शहर में पहले एक्यूआई करीब चार सौ तक पहुंच चुका था जिसमें लॉकडाउन के बाद तेजी से गिरावट आनी शुरू हुई। महीने भर में ही एक्यूआई 50 और उसके कुछ दिन बाद 40 तक पहुंच गया। वायुमंडल इस कदर साफ हुआ कि बरेली से ही उत्तराखंड के पहाड़ तक दिखने लगे। लोगों ने यह संकल्प भी लिया कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी वे पर्यावरण को इसी तरह शुद्ध बनाए रखेंगे। मगर अनलॉक-1 शुरू होते ही सारे संकल्प हवा हो गए। हालात अब यह हैं कि ढाई महीने बाद तापमान फिर पुराने स्तर पर स्थिर है। पर्यावरणविदों ने लोगों से अपील की है कि बेहद जरूरी होने पर ही वाहनों का प्रयोग करें। इससे वे कोरोना से भी बचे रहेंगे और प्रदूषण भी तेजी से नहीं बढ़ेगा।
विकास परियोजनाएं शुरू होने से पड़ा सबसे ज्यादा असर.. बाकी कसर ट्रैफिक से पूरी
बरेली कॉलेज के बॉटनी डिपार्टमेंट के एमिरेट प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक अनलॉक होने से पर्यावरण में बदलाव लाजिमी था। सबसे ज्यादा फर्क शहर में एक बार फिर निर्माण कार्य शुरू होने से आया है। कहीं भी एनजीटी की गाइडलाइन के तहत निर्माण सामग्री का रखरखाव नहीं हो रहा है। तीन महीने तक की बंदी की कसर भी लोग वाहनों को बेवजह इस्तेमाल करके पूरी कर रहे हैं। जगह-जगह खुदाई होने से धूल के गुबार उड़ रहे हैं। जहरीली गैसें वायुमंडल पर फिर हावी होने लगी हैं। उन्होंने कहा कि विकास के लिए बेशक निर्माण होना बेहद जरूरी है मगर यह नियमों के अनुरूप हो तो पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। लोगों को सजग होकर पर्यावरण संरक्षण के बारे में सोचना होगा।
प्रदूषण जितना बढ़ेगा.. उतना ही ज्यादा घातक होगा कोरोना का संक्रमण भी
वरिष्ठ फिजिशयन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक प्रदूषण का स्तर बढ़ने से बीमारियों का ग्राफ भी बढ़ेगा। वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी कई जहरीली गैसें शरीर में जाकर लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करेंगी। ऐसी स्थिति में अगर कोई व्यक्ति संक्रमित होगा तो फेफड़ों में संक्रमण बढ़ेगा जिससे उसकी हालत गंभीर हो सकती है। उन्होंने कोविड प्रोटोकॉल नियमों के प्रति लोगों से सजग होने की अपील की करते हुए कहा कि कोरोना के साथ प्रदूषित होती हवा से बचाव के लिए मास्क का प्रयोग करना जरूरी है।
वायु प्रदूषण कम करने के लिए बनी एक और कार्य योजना
कुछ समय पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय की ओर से शासन को वायु प्रदूषण कम करने के लिए निर्धारित समयानुसार कराए जाने वाले कार्यों का खाका तैयार कर भेजा है जिसमें 15 दिन से अधिकतम 2021 के आखिर तक हर हाल में जिले से वायु प्रदूषण कम करने का दावा किया है। इसमें एक्यूआई दर्ज करने के लिए मोबाइल वैन चलाने, उद्योगों की मॉनीटरिंग के लिए कंट्रोल यूनिट बनाने, निर्माण कार्यों को एनजीटी की गाइडलाइन के तहत कराने, नियमों की अनदेेखी पर जुुर्माना या कार्रवाई आदि समेत करीब 72 से ज्यादा बिन्दुवार रिपोर्ट शासन को भेजी है।
लॉकडाउन में स्वच्छ हुआ वायुमंडल अनलॉक होने के बाद फिर प्रदूषित होने लगा है। एक्यूआई में लगातार वृद्धि रिकॉर्ड हो रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों को सजग होना बेहद जरूरी है। जनसहयोग के बगैर पर्यावरण का संरक्षण मुश्किल है। - रोहित सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड