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UP: कैंसर से ज्यादा घातक आईएलडी, फेफड़े आधे खराब होने पर होती है जानकारी, वायु प्रदूषण से होती है ये बीमारी

Mon, 01 Dec 2025 03:59 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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प्रेसवार्ता के दौरान जानकारी देते डॉ दीपक तलवार व अन्य पदाधिकारी - फोटो : अमर उजाला
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इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (आईएलडी) कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक होती है। इसे हाइपोसेंसिटिव ह्यूमेनाइटिस यानी फार्मर्स लंग भी कहा जाता है। आधे से ज्यादा फेफड़े खराब होने पर ही इसका पता चलता है। बरेली के आईएमए भवन में चल रहे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के वार्षिक अधिवेशन आईएमए यूपीकॉन-2025 में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. दीपक तलवार ने ये जानकारी दी।

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उन्होंने कहा कि आईएलडी की चपेट में आने वाले व्यक्ति में करीब पांच साल बाद लक्षण उभरते हैं। इलाज शुरू होने पर अगले चार-पांच साल ही मरीज की जीवन प्रत्याशा होती है। इसके बाद लंग ट्रांसफर ही विकल्प है। इसका अब तक कोई ठोस इलाज नहीं मिला है। लक्षण आधारित दवाएं दी जाती हैं। अगर समय से रोग का पता चल जाए तो इसे दवाओं से नियंत्रित कर सकते हैं।

वरिष्ठ चेस्ट फिजिशियन डॉ. वीके धस्माना ने कहा कि ज्यादातर डॉक्टरों को इस रोग के बारे में नहीं पता। इसलिए वायरल सर्दी, जुकाम, खांसी का इलाज करते हैं। ज्यादा दिक्कत होने पर टीबी का इलाज शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि आईएलडी ट्रैक होने तक देर हो चुकी होती है।

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वायु प्रदूषण है प्रमुख वजह
डॉ. तलवार के मुताबिक आईएलडी का मुख्य कारक वायु प्रदूषण है। दिल्ली निवासियों के फेफड़ों पर अभी भले असर न दिखे, लेकिन लंबे समय तक इस हवा में सांस लेने से चपेट में आने की आशंका से इन्कार नहीं कर सकते। इसलिए घरों में एयर प्यूरिफायर, ह्यूमिडीफायर और बाहर निकलने पर मास्क लगाएं। छोटे शहरों में भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है।
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फाइब्रोसिस बने तो ऑक्सीजन पर रहता है मरीज
साइंटिफिक चेयरमैन डॉ. सुदीप सरन के मुताबिक, लक्षणों को लगातार नजरंदाज करने से फेफड़ों में फाइब्रोसिस बनता है। इससे जरा सी एलर्जी भी बेहद तकलीफदेह होती है। व्यक्ति ऑक्सीजन पर रहता है। समय पर रोग का पता चलने पर इलाज मुमकिन है। अस्थमा रेमिसन बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट होता है। ये एंटीबॉडी टारगेटेड मेडिसिन सिर्फ उस तत्व से निजात दिलाती है जो रोग का कारक है। शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। 

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