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Bareilly News: रजवाड़े की परंपरा से बनी पहचान, आज भी खेली जा रही अनोखी होली

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कलीनगर। रजवाड़े के रूप में पहचान रखने वाला माधोटांडा कस्बा आज भी अपनी अनोखी होली के लिए जाना जाता है। समय के साथ जहां रजवाड़े की चमक फीकी पड़ी। वहीं, होली का वह रंगीन इतिहास का दायरा अब सीमित रह गया है। हालांकि यहां यह रस्म आज भी महिलाएं निभा रही हैं। वे फाग लोकगीत गाने के अलावा फाग भी लोगों से वसूलती हैं, जो कि आज भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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माधोटांडा की होली की सबसे खास पहचान थी। हिंदू समुदाय की महिलाओं की होली। होली के दूसरे दिन सुबह तड़के ही कस्बे की महिलाएं अपने घरों से निकल पड़ती थीं। उनका पहला पड़ाव प्रसिद्ध रानी सुंदर द्वारा निर्मित मंदिर होता था, जहां आज भी अष्टधातु की मूर्तियां स्थापित हैं। देवी-देवताओं को रंग-गुलाल अर्पित कर महिलाएं पूरे जोश और उल्लास के साथ होली खेलती थीं और पारंपरिक फाग के गीत गूंजने लगते थे। मंदिर से निकलने के बाद महिलाओं की यह टोली कस्बे के मुख्य मार्ग पर पहुंच जाती थी। माधोटांडा से होकर गुजरने वाला पूरनपुर-खटीमा मार्ग कुछ घंटों के लिए पूरी तरह ठप हो जाता था। उस समय आम नागरिकों के अलावा नेता और अधिकारी भी सब महिलाओं की इस मशहूर टोली के सामने बेबस नजर आते थे।
उनका मशहूर नारा होता था रंग खेलो, नहीं तो फगुआ दे दो। इस होली के आगे किसी की तानाशाही नहीं चलती थी। महिलाओं की होली का असर इतना था कि कस्बे के कई बुजुर्ग घरों में ही रहना पसंद करते थे, जबकि युवा और कुछ परिवार शारदा डैम, चूका और जंगल की ओर चले जाते थे, जहां वे पिकनिक मनाते और पकवान बनवाकर समय बिताते थे। महिलाओं की रंग वाली होली दोपहर करीब तीन बजे तक चलती थी। इसके बाद सभी महिलाएं नए वस्त्र धारण कर फिर से होली के स्थल पर जुटती थीं। देर शाम तक मुख्य मार्ग पर आवागमन लगभग बंद रहता था और सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल भी तैनात किया जाता था।
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समय में बदलाव के साथ महिलाएं निकलती तो हैं, लेकिन फगुआ गीत और फगुवा वसूलने का चलन नहीं दिखता। हालांकि यह परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में निभाई जा रही है। कस्बे के बुजुर्गों का कहना है कि यह अनोखी होली की परंपरा आज भी माधोटांडा की पहचान बनी हुई है। हर समुदाय के लोग इस रीति-रिवाज का सम्मान करते हैं। संवाद
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