यह है आरोप
रमोद कुमार सक्सेना का आरोप है कि 24 जनवरी 2019 की शाम पांच बजे तत्कालीन एडीएम सिटी ओपी वर्मा ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया। वहां रमाकांत शुक्ला, प्रेमचंद्र और सुनील कुमार शर्मा सहित चकबंदी विभाग के कई अधिकारी और कर्मचारी पहले से मौजूद थे। चैंबर में घुसते ही एडीएम सिटी उनको गालियां देने लगे। कोने में रखा डंडा उठाकर रमोद कुमार सक्सेना को पीटना शुरू कर दिया। उन पर दबाव बनाया गया कि वह चकबंदी विभाग में हुए फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी अपने सिर ले लें। इन्कार करने पर उनके साथ और बर्बरता की गई।
कोर्ट ने की गंभीर टिप्पणी
अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की ओर से यह दलील देने की कोशिश की गई कि आरोपी एक लोकसेवक (सरकारी अधिकारी) है। इसलिए धारा 197 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन से अग्रिम मंजूरी लेना अनिवार्य है। अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी अधीनस्थ कर्मचारी को चैंबर में बुलाकर पीटना, गाली देना या प्रताड़ित करना किसी भी लोकसेवक के पदीय कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि पद की शक्ति का दुरुपयोग करने वाले अधिकारी को इस तरह का विधिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
फर्जी बयान पर हस्ताक्षर कराए और भिजवा दिया जेल
शिकायतकर्ता के अनुसार, मारपीट के बाद एडीएम सिटी ने अपने पेशकार जयवीर सिंह से एक फर्जी बयान तैयार करवाया। रमोद कुमार सक्सेना को धमकाकर जबरन उस फर्जी बयान पर हस्ताक्षर करा लिया। उसी दिन रमोद कुमार सक्सेना के खिलाफ शांति भंग की धारा 151/107 सीआरपीसी के तहत फर्जी कार्रवाई करते हुए उन्हें कोतवाली पुलिस के हवाले कर दिया गया, ताकि वह आवाज न उठा सकें। 25 जनवरी 2019 को उन्हें जेल भेज दिया गया। एक फरवरी को वह जमानत पर जेल से बाहर आए।