इससे करदाताओं को मासिक आधार पर ब्याज की गणना की उलझन से मुक्ति मिल गई है। अगर किसी उपभोक्ता का पांच हजार रुपये कर बनता है और बिल जारी होने के बाद वह इसे जमा नहीं कर पाता है तो हर माह एक फीसदी ब्याज देना होता था। अब उपभोक्ताओं की जेब का बोझ कम हुआ है।
मुख्य कर निर्धारण अधिकारी पीके द्विवेदी ने बताया कि करदाताओं की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है ताकि संग्रह की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जा सके। हर माह ब्याज के आर्थिक दबाव से मुक्ति मिलने से अब शहरवासी बकाया कर का भुगतान आसानी से कर सकेंगे।