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आयुष्मान कार्ड रिजेक्ट करने वालों पर स्वास्थ्य विभाग मेहरबान

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बरेली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना को धता बताकर आयुष्मान कार्ड पर गंभीर बीमार लोगों का इलाज न करने वाले निजी अस्पतालों पर स्वास्थ्य विभाग मेहरबान है। इन अस्पतालों की हीलाहवाली के चलते कई मरीजों की जानें भी जा चुकी हैं। इन्हें सबक सिखाने के लिए परिवार वालों ने शिकायती पत्र लेकर स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के यहां खूब चक्कर भी लगाए मगर किसी ने इन पर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ चेतावनी देकर सभी मामले रफा-दफा कर दिए गए।
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इलाज के इंतजार में दम तोड़ गए मतलूब
सितंबर माह में दीवानखाना के मतलूब हुसैन को आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद शहर के चार बड़े अस्पतालों में इलाज नहीं मिला। परिवार के सदस्य पूरी रात उन्हें एक अस्पताल से लेकर दूसरे अस्पताल तक दौड़ते रहे। आखिरकार उनकी जान चली गई। परिवार वालों की शिकायत पर स्वास्थ्य विभाग ने जांच कराई तो अस्पतालों की हीलाहवाली सामने आ गई लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। मामला मीडिया में उछला तो अस्पतालों को चेतावनी जारी कर मामला रफा-दफा कर दिया गया।
खराब बता दिया आयुष्मान कार्ड
सुभाषनगर निवासी शिखा ने पिता कन्हईलाल को न्यूरो संबंधी दिक्कत होने पर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। यहां कुछ दिन रखने के बाद कह दिया कि उसका आयुष्मान कार्ड खराब है और वे लोग इलाज नहीं कर सकते। दो दिसंबर को शिखा के पिता की मौत हो गई। उन्होंने निजी अस्पताल को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराते हुए डीएम, सीएमओ और सीएम पोर्टल पर शिकायत की लेकिन कार्रवाई के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
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इलाज के लिए बेचना पड़ा टेंपो और मकान
कटरा चांद खां निवासी सुरेश के पैर में असहनीय दर्द हुआ। कुछ दिन जिला अस्पताल में इलाज कराया लेकिन आराम नहीं मिला। कुछ दिनों बाद पैर काला पड़ गया और चलना-फिरना बंद हो गया। इलाज के लिए उसे टेंपो और मकान भी बेचना पड़ा। आयुष्मान कार्ड लेकर शहर के एक निजी अस्पताल पहुंचे तो पैर काटने की बात कही। सुरेश तैयार हो गया लेकिन अस्पताल वालों ने आज तक ऑपरेशन नहीं किया। एक सप्ताह बाद आने को कहकर काफी दिन से टाल रहे हैं।

जो भी शिकायत आती है, उस पर जांच कराकर कार्रवाई की जाती है। कई मामलों में शिकायतकर्ताओं को बयान के लिए बुलाया जाता है और वे नहीं आते हैं। ऐसे में भी जांचे प्रभावित होती हैं। कई ऐसी भी शिकायतें हैं, जिन्हें करने के बाद शिकायतकर्ता ही नहीं लौटे।
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- डॉ. विनीत शुक्ल, सीएमओ
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