ग्रामीणों पर टैक्स का बोझ अब और बढ़ सकता है। इसके लिए जिला पंचायत और नगर पंचायतों की तर्ज पर ग्राम पंचायतों को भी टैक्स वसूली का अधिकार मिला है। वह जल और स्वच्छता टैक्स लगा सकती हैं। पंचायत राज अधिनियम में मिले प्रावधान को आगे बढ़ाते हुए शासन ने ग्राम पंचायतों को टैक्स के जरिए राजस्व में वृद्धि करने के निर्देश दिए हैं।
नई ग्राम पंचायतों को 14 वें वित्त आयोग के अंतर्गत मिलने वाली धनराशि के उपयोग के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों का निर्धारण करते हुए प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव पंचायत चंचल कुमार तिवारी ने ग्राम पंचायतों के राजस्व में वृद्धि का शासनादेश जारी किया है। निर्देश दिए हैं कि सारी ग्राम पंचायतों को पिछले वर्ष की तुलना में अपने राजस्व श्रोतों में अनिवार्य रूप से वृद्धि करनी है और यह वृद्धि आडिट रिपोर्ट में प्रदर्शित होनी चाहिए। जिला पंचायत राज अधिकारी दिनेश सिंह ने बताया कि ग्राम पंचायतों के राजस्व में वृद्धि टेक्स के जरिए करने का प्रावधान है। इसके अंतर्गत सारी ग्राम पंचायतें अपने गांव के निवासियों से टैक्स वसूल सकती हैं। वे जल और स्वच्छता के अलावा पंचायतों की परिसंपत्तियों पर अन्य मदों में भी टेक्स लगा सकती हैं। यही टेक्स उनकी आय का जरिया होगा। बता दें कि ग्राम पंचायतों में अब हैंडपंप के बाद पाइप लाइन परियोजना से वाटर सप्लाई की जाएगी। कई गांवों में इस प्रोजेक्ट पर काम किया जाना है। उस पर ग्रामीणों को टेक्स देना पड़ सकता है। गांवों की गलियों और नालियों की साफसफाई के लिए ग्राम पंचायतों में सफाई कर्मी तैनात किए गए हैं। इनको सरकार वेतन देती है। वैसे, जिला पंचायत ग्रामीणों से टैक्स वसूल ही रही है।
गांव में कौन देगा टैक्स
वाटर और सफाई पर टेक्स का प्रावधान होने पर प्रधानों को भी आपत्ति है। क्यारा गांव के प्रधान सर्वेश्वरपाल सिंह का कहना है कि गांव में अब कोई टेक्स नहीं देगा और न ही यह व्यवहारिक है। वह कहते हैं कि गांव में अभी भी 80 फीसदी से ज्यादा आबादी बहुत गरीब है। मजदूरपेशा और बेरोजगार लोग ज्यादा हैं, उनसे भला कैसे टेक्स लिया जा सकता है।
पहले लिया जाता था टैक्स
ग्राम पंचायत 90 के दशक तक टैक्स वसूला करती थीं, तब उनको सरकार से विकास कार्यों के लिए कोई ग्रांट नहीं मिलती थी। ऐसे में गांव के विकास के लिए वह साइकिल, रिक्शा और तांगों पर टोकन लगाकर टेक्स लगाती थीं। फेरी लगाने वाले और मछली मारने वालों से भी कुछ न कुछ लेकर रसीद काट दी जाती थी। तालाब के पट्टे और आसामनी पट्टे भी आय का जरिया थे लेकिन अब टेक्स नहीं लिया जाता।