बरेली। शहर के मजदूर अड्डे भी अब मजबूर हो गए हैं, जो अड्डे सालों से इन्हें दो वक्त की रोटी दिला रहे थे अब दो महीने से इनकी रोजी-रोटी का जुगाड़ तक नहीं कर पा रहे।
शहर के तीन प्रमुख मजदूर अड्डे कुतुबखाना, शील चौराहा राजेंद्र नगर और किला साहूकारा पर हैं, जहां मजदूर काम की तलाश में रोज जमा तो होते हैं, लेकिन उन्हें यहां काम नहीं मिलता। घंटों इंतजार करने के बाद वह अपने घरों को लौट जाते हैं। गुरुवार सुबह 6.30 बजे से ही अमर उजाला की टीम ने इन तीनों मजदूर अड्डों की लाइव रिपोर्टिंग की।
समय- सुबह 6.30 बजे
स्थान- कुतुबखाना
यहां बीस दिन से काम ही नहीं मिला
सुबह लोग अपने जरूरी कामों के लिए निकल रहे हैं। कोई दूध की डोलची लिए जा रहा है तो कोई सिर्फ टहलने निकला है। ऐसे में इस चौराहे पर राज मिस्त्री के साथ अलग-अलग तीन से चार जगहों पर कुछ मजदूर काम की तलाश में बैठे हैं। घनश्याम, राम बहादुर, जफर, ओमप्रकाश, मनोज ने बताया कि यहां इस चौराहे से बीते बीस दिनों से किसी को कोई काम नहीं मिला है। रोजाना आते हैं और नौ बजे तक इंतजार करते रहते हैं लेकिन काम नहीं मिल रहा। मजदूर रोजी-रोटी चलाने के लिए कर्जदार हो गए हैं। कहा कि पहले यहां आने के आधे घंटे के अंदर ही सभी मजदूरों को काम मिल जाता था। कभी आठ बजे तक भी इंतजार नहीं करना पड़ा, लेकिन अब नौ बजे तक भी काम नहीं मिल रहा। राजमिस्त्री जमील अहमद की कमर झुकी हुई है। थक गए तो अब काम की तलाश में साइकिल के डंडे पर खुद को टिकाए खड़े हैं। कहते हैं कि काम के लिए कभी इतना नहीं भटकना पड़ा। हम यहां करीब 7.15 मिनट तक रुके, लेकिन यहां इन्हें लेने कोई नहीं आया।
समय - 7.30
स्थान- शील चौराहा, राजेंद्र नगर।
बस भैया यहां सिर्फ अभी पेड़ की छांव ही मिल रही
शील चौराहा पर पास स्थित विशालकाय पेड़ की छांव में काम की आस में सुबह करीब छह बजे से मजदूर जमा होना शुरू हो गए। आधा सैंकड़ा की तादात में मजदूर जमा थे, लेकिन उन्हें कोई काम नहीं मिला। जमील, आसिफ, जहीर अहमद ने बताया कि यहां कभी रुकना ही नहीं पड़ता था। आकर खड़े नहीं हो पाते थे कि काम मिल जाता था। स्थिति यह भी थी कि कभी-कभी मजदूरों की कमी पड़ जाती थी। आज स्थिति यह है कि यहां लाकडाउन के बाद सिर्फ पेड़ की छांव मिल रही है। कभी कभार इक्का दुक्का मजदूरों को काम मिल जाता है तो ठीक, नहीं तो अधिकतर मजदूरों के पास काम नहीं है। ताहिर कहते हैं कि मजदूरों के पास जमा पूंजी तो होती नहीं, इसलिए रोटी चलाने को लगभग सभी मजदूर कर्जदार हो गए हैं। यही स्थिति रही तो हालात बहुत खराब होने वाले हैं। यहां हम लोग करीब आधा घंटे खड़े रहे। इस दौरान एक भी मजदूर को काम नहीं मिला।
समय - सुबह 8.15 बजे
स्थान - किला साहूकारा
बस हाजिरी लगाने आते हैं अड्डे की
यहां सड़क किनारे फुटपाथ पर बंद दुकानों के सामने लाइनवार कई मजदूर गुटों में बैठे हैं। इतने निश्चिंत भी हैं कि इन्हें लग रहा है कि शायद काम आएगा ही नहीं। सत्यपाल, उस्मान, जमीर मियां, जाहिद खान बताते हैं, पिछले एक महीने से तो काम मिला नहीं है। किसी एकाध मजदूर को काम मिल गया तो जानकारी नहीं। पहले कभी आधा घंटा से अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा। अब यहां सिर्फ इंतजार करते हैं। सीधे कहें तो अब काम नहीं है, लेकिन हाजिरी लगाने आते हैं और दो ढाई घंटे इंतजार के बाद घर लौट जाते हैं। यहां भी हमारी टीम करीब 25 मिनट तक रुकी रही, लेकिन मजदूरों को काम नहीं मिला।
प्रवासी मजदूरों का तो मनरेगा बन गई सहारा
बरेली। शहर के मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है, लेकिन प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा सहारा बन गई है। लॉकडाउन में घर आए 18 हजार प्रवासी मजदूर योजना के तहत गांवों में ही काम कर रहे हैं। गांवों में जल संचयन, खेत समतलीकरण और चकरोड निर्माण सरीखे काम कर प्रवासी अपने परिवार का खर्च चला रहे हैं। कमाने के लिए वह दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्य चले गए थे। जब कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 25 मार्च से लॉकडाउन लागू किया तो बड़ी संख्या में प्रवासी गांव लौटने लगे। सरकारी मदद या खुद वाहन की व्यवस्था कर करीब 18 हजार 503 लोग जिले में लौट चुके हैं। जिन लोगों ने क्वारंटीन की अवधि पूरी कर ली अब वह काम की तलाश में परेशान हैं। ऐसे में मनरेगा ही उन्हें खुद व परिवार के लिए दो रोटी का जुगाड़ करती दिखी। यहां बता दें कि इनमें 17 हजार 222 हजार के आसपास प्रवासी हैं। बड़ी संख्या में अपने गांव लौटे प्रवासी श्रमिक काम पाने के लिए प्रधान और सेक्रेटरी के संपर्क में हैं।