हाथियों को वापस नेपाल भेजने के लिए 20 दिन चले ऑपरेशन पर वन विभाग ने फूंक डाले 42 लाख
जिन किसानों की फसलें रौंदी, उन्हें मुआवजा देने के लिए सर्वे तक नहीं कराया
बरेली। नेपाल से भटककर बरेली तक पहुंचे दो हाथियों के मुकाबले सिस्टम की भूख ज्यादा बड़ी निकली। 20 दिन तक जिले में इधर-उधर भटकते रहे हाथियों ने खेतों में खड़ी गन्ने और धान की फसलों से अपनी भूख मिटाई तो अफसरों ने भी उन्हें घेरकर वापस नेपाल भेजने के बहाने सरकारी खजाने पर हाथ साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 20 दिन में ही 42 लाख रुपये से ज्यादा की रकम खर्च कर डाली। और भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि वन विभाग ने तो हाथ के हाथ विभागीय खाते से अपना खर्च वसूल लिया लेकिन किसानों को मुआवजा देने के लिए उनकी फसलों का सर्वे तक नहीं कराया गया।
दोनों नेपाली हाथी नेपाल से पीलीभीत के टाइगर रिजर्व में घुसने के बाद अमरिया क्षेत्र से होते हुए 27 जून को बहेड़ी की सीमा में घुस गए थे। बहेड़ी में दोनों हाथियों ने उत्पात मचाते हुए किसानों की फसलें रौंदनी शुरू की तो वन विभाग ने उन्हें वापस नेपाल भेजने के लिए ऑपरेशन शुरू किया। कई दिन तक वन विभाग की टीमें हाथियों के पीछे-पीछे घूमती रहीं और उसके बाद एक्सपर्ट की मदद ली गई। असम और पश्चिम बंगाल से हांका लगाने के लिए छह प्रशिक्षित वनकर्मियों को बुलाया गया। उत्तराखंड और दिल्ली के वन्यजीव विशेषज्ञों और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अफसर के साथ कुछ जिलों के वन विभाग अधिकारियों ने भी बरेली आकर डेरा डाला।
इन अफसरों के खाने-पीने, रहने की सुविधाओं पर रोजाना दो लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए गए। इन्हीं में हांका टीम का भी खर्च शामिल था। 20 दिनों के ऑपरेशन पर 42 लाख का खर्च दिखाया गया जिसे दो किस्तों में शासन से मांगा गया था। पहले 16 लाख और फिर हाथियों को वापस भेजने के बाद 26 लाख की डिमांड भेजी गई। अफसरों के मुताबिक पहली किस्त शासन से मिल गई है, दूसरी का भुगतान होना बाकी है। हालांकि अफसरों ने यह पूरी रकम विभागीय खाते से खर्च की थी लिहाजा उन्हें इसके भुगतान को लेकर कोई टेंशन भी नहीं है। किस मद में कितना खर्च हुआ, अफसर इसका ब्योरा देने से बच रहे हैं। उधर, जिन किसानों की फसलें हाथियों ने रौंद डाली थीं, उन्हें अब तक मुआवजे के नाम पर कुछ नहीं मिला। राजस्व विभाग ने उनकी फसलों का सर्वे तक नहीं कराया।
24 घंटे जंगल में और खाना बरेली के नामी होटलों का
कहने को वन विभाग की टीमें 24 घंटे हाथियों की निगरानी के लिए जंगलों में पड़ी रहती थीं लेकिन फिर भी अफसरों के लिए बरेली के उन नामी रेस्टोरेंट से खाना पहुंचता था जिनकी एक-एक प्लेट पांच-छह सौ रुपये की थी। बंगाल से आई हांका टीम को पीलीभीत में ठहराया गया था जहां उनके खाने-पीने का खर्च एक एनजीओ ने उठाया था। निचले दर्जे के वन कर्मियों के लिए खाने का स्थानीय तौर पर बंदोबस्त किया जाता था। पुलिस का खाना थानों से आता था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अफसरों ने 42 लाख रुपये आखिर कहां खर्च कर दिए।
भूख हाथी सी.. मुफ्त के आम खाए, घर भी ले गए
नेपाली हाथियों को खदेड़ने के लिए चलाए गए रेस्क्यू ऑपरेशन के प्रत्यक्षदर्शियों और मीरगंज इलाके के किसानों के मुताबिक वन विभाग के अफसरों ने देहात के लोगों का भी खूब दोहन किया। अक्सर टीमों में शामिल अफसर किसी भी आम के बाग की छांव में डेरा जमाकर बैठ जाती थी। जमकर आमों की दावत उड़ाई जाती थी और बाग के मालिकों को हाथियों से डराकर घर ले जाने के लिए भी आम गाड़ियों में भरवा लिए जाते थे। लोगों का कहना है कि अफसरों के लिए यह रेस्क्यू ऑपरेशन पिकनिक मनाने जैसा लगता था। जब हाथियों ने लोगों की जान लेनी शुरू की, तब जरूर कुछ गंभीरता दिखाई दी।
वर्जन:
हाथियों को रेस्क्यू करने के ऑपरेशन में सौ से डेढ़ सौ लोगों की टीम लगी थी जिसके खानपान और रहन-सहन के खर्च विभाग ने किए। पश्चिम बंगाल और असम की हांका टीम के आवागमन के साथ दूसरे जिलों से आए वनकर्मियों का खर्च भी करना पड़ा। इसलिए 42 लाख रुपये का बजट खर्च हुआ।- भरत लाल, डीएफओ