बहेड़ी। केसर चीनी मिल पर किसानों का 166 करोड़ रुपये का बकाया है। भुगतान न होने से गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। किसान अब पड़ोस की चीनी मिलों को गन्ना ले जाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि कुछ किसान दूसरी मिलों को भी गन्ना पहुंचा रहे हैं।
चौधरी बिजेंद्र सिंह, राजेश्वर गंगवार समेत अन्य किसानों का कहना है कि करीब दस वर्षो से चीनी मिल प्रबंधन ने यह नीति बना ली है कि पिछले पेराई सत्र का भुगतान रोक कर चलो और आर्थिक समस्याओं का रोना रोकर भुगतान अटकाते रहो। केसर चीनी मिल से जुड़े गन्ना किसान अब अपनी चीनी मिल को गन्ना न देकर मीरंगज, सितारगंज, फरीदपुर, पीलीभीत की चीनी मिलों को ले जाकर गन्ना सप्लाई कर रहे हैं। कई गन्ना खरीद केंद्रों को किसान दूसरी चीनी मिलों को आवंटित करने की मांग कर रहे हैं।
अगर गौर किया जाए तो केसर चीनी मिल के पास गन्ने के क्षेत्रफल का काफी बड़ा रकबा है, जो पड़ोस की अन्य चीनी मिलों के मुकाबले काफी ज्यादा है। क्षेत्र में मुख्य फसल के रूप में गन्ने की खेती सबसे ज्यादा होती है। इसमें पिछले सत्र का बकाया 48 करोड़ ,चालू पेराई सत्र का 118 करोड़ रुपये की राशि है। दूसरी चीनी मिलों के दलाल सरकार द्वारा तय मूल्य पर किसान के खेतों से गन्ना खरीद कर ले जा रहे हैं। जिन किसानों के पास अपने संसाधन है, वो अपने ट्रैक्टर-ट्राॅलियो से दूसरी चीनी मिलों तक पहुंचा रहे हैं।
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पिछले सत्राें में रिकार्ड पेराई की
अगर आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 22-23 में केसर चीनी मिल ने एक करोड़ 14 लाख किवंटल पेराई की थी। वहीं, 23- 24 में चीनी मिल ने 94 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई की। चालू पेराई सत्र में एक करोड़ के करीब पेराई का लक्ष्य दिया गया है, जो पूरा हो पाना संभव नहीं दिखाई देता।
वर्जन
केसर चीनी मिल और क्षेत्र के किसानों का सफर बहुत लंबा है। मिल को जब-जब आर्थिक परेशानी हुई, तब-तब किसानों ने भरपूर सहयोग किया। जल्द ही पिछले सत्र का भुगतान अदा कर चालू सत्र का भुगतान भी शुरू कर देंगे। किसान किसी के बहकावे में न आए, मिल को ही गन्ने आपूर्ति करें।
- शरद मिश्र, सीईओ, केसर चीनी मिल
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