बरेली। ‘पौरुष’ की पुरानी परिभाषा बदलने की जरूरत है। नई परिभाषा ऐसी हो जो पुरुष को सहज, सरल और सौम्य बनाए। पौरुष के बल और अक्खड़ता के प्रकाश में लैंगिक न्याय संभव नहीं है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में ‘सामाजिक विकास, सामाजिक व लैंगिक न्याय’ विषय पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. संजय श्रीवास्तव ने यह विचार रखा। उन्होंने कहा कि समाज में आज भी महिलाओं को लेकर तमाम भ्रम है। एक स्त्री से हमेशा उम्मीद की जाती है कि वह स्त्री की तरह व्यवहार करें। लोगों की नजर में स्त्री की तरह व्यवहार करने का मतलब होता है पर्दा और मर्यादा में रहना। लोगों के सामने तेज आवाज में बहस या खुलकर अपनी बात न रखना भी इसी का हिस्सा है।
कई बार स्त्री अपने बड़े सपनों के बारे में बताती है तो लोग कहते हैं कि यह लड़की बहुत आक्रामक है। यही बड़े सपने कोई लड़का रखता है तो उसे गर्व के साथ देखा जाता है। उन्होंने कहा कि लैंगिक न्याय के लिए जरूरी है कि पुरुष भी घरेलू जिम्मेदारियां निभाएं। कामों को लिंग के आधार पर न बांटा जाए। इसके बाद सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस के उपनिदेशक सतीश कुमार सिंह ने कहा कि समाज में लैंगिक न्याय के लिए हमें बढ़-चढ़कर काम करना होगा। इस मौके पर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रो. संजय ने सबको शपथ दिलाई- ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जिससे समाज में महिला और पुरुष को बराबर हिस्सा मिले। इसकी शुरुआत हम स्वयं से करेंगे। अपनी सोच, अपने व्यवहार और क्रियाकलापों पर निगरानी रखेंगे। कार्यक्रम के अंत में आयोजन सचिव डॉ. अजय त्रिवेदी ने आभार व्यक्त किया।