बरेली। रक्षाबंधन में अब महज एक सप्ताह बाकी है। मुख्यालय स्तर से शत प्रतिशत रोडवेज बसों को पूरी तरह से फिट करने और रक्षाबंधन के दौरान पूरी क्षमता के साथ बसों का संचालन का आदेश दिया गया है। इस बीच रोडवेज बसों के टायर फटने के मामले बढ़ गए हैं। टायर बदलने में खेल के आरोप भी लग रहे हैं।
टायरों की खराबी के कारण बरेली डिपो के टायर सेक्शन में इन दिनों 50 से ज्यादा बसें खड़ी हैं। बृहस्पतिवार रात डिबाई के पास बरेली डिपो की बस का हाईवे पर दौड़ते वक्त अगला टायर फट गया। इससे बस अनियंत्रित होकर खाई में उतर गई। बस में सवार 42 यात्री बाल-बाल बचे।
नियमानुसार बस के टायर 75 से 80 हजार किलोमीटर का सफर तय करने के बाद बदल दिए जाने चाहिए। आरोप है कि टायरों को 1.20 लाख किलोमीटर सफर के बाद भी नहीं बदला जा रहा। नई बसों के नए टायर निकालकर पुराने टायर लगाने के आरोप भी लग रहे हैं।
एक चालक ने बताया कि रोड पर दौड़ते समय बस के अगले पहियों का सबसे ज्यादा मूवमेंट होता है। सुरक्षित यात्रा के लिए जरूरी है कि अगले टायर पूरी तरह से फिट होने चाहिए, लेकिन वर्कशॉप में खेल किया जा रहा है। जिस बस का अगला टायर बृहस्पतिवार रात फटा उस पर चालक प्रमोद सिंह और परिचालक अवधेश थे।
दुर्घटना रात में दो बजे हुई। चालक ने बताया कि हादसे के समय बस 50 किमी प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार पर थी। बस को खाई से निकालने के लिए क्रेन संचालक को 2500 रुपये का भुगतान करना पड़ा।
एक अन्य चालक ने बताया कि उनकी बस खुदागंज-दिल्ली के बीच चलती है। वर्कशॉप की लापरवाही के कारण चलती हुए बस के पहिये अचानक क्लिच प्लेट की वजह से जाम हो गए। गनीमत रही कि कोई हादसा नहीं हुआ।
घटिया ब्लेजर फिल्टर से घुट रहा इंजन का दम
बसों के इंजन में लगने वाले ब्लेजर फिल्टर में भी खेल हो रहा है। 2000 से 2500 रुपये के आने वाले ब्लेजर फिल्टर के स्थान पर 300-400 रुपये वाला फिल्टर लगाया जा रहा है। ऐसे में बसों के इंजन पर अतिरिक्त दबाव से इंजन जल्द खराब हो रहा है। एक ही महीने में एक ही बस का इंजन दो-दो बार तक बनाना पड़ रहा है। यह हाल केवल बरेली डिपो में नहीं रुहेलखंड, पीलीभीत और बदायूं डिपो का भी है।
कर्मचारियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल
बसों में हैवी ड्यूटी टायर होते हैं। इस एक टायर की कीमत 15 से 35 हजार रुपये तक होती है। टायर में आसानी से खेल कर दिया जाता है। हैवी ड्यूटी नया टायर उतार कर उनके स्थान पर रबर चढ़ा हुआ दूसरा टायर लगा दिया जाता है। चारों डिपो के वर्कशॉप और क्षेत्रीय कार्यकाल में बसों के टायर बदलने और नए व पुराने टायरों का रिकार्ड तक मेंटेन नहीं किया जा रहा। ऐसे मेंं वर्कशॉप की जिम्मेदारी संभालने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।
वर्जन :
राजस्व के मामले में बरेली डिपो मुरादाबाद डिपो से आगे है। आमतौर पर पिछले टायर पुराने और अगले नए रखे जाते हैं। तय किलोमीटर पूरे होने पर टायर बदले जाते हैं। अगले टायर फटने के मामले बढ़ने के कारण तलाशने के साथ ही संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। - मोहम्मद अजीम, क्षेत्रीय प्रबंधक