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कुलपति जी बिल्कुल ठीक! .. इसे ही कहते हैं सांप मर जाना और लाठी भी न टूटना

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बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय से बीएड की एक फर्जी मार्कशीट जारी हुई जिस पर हाथ के हाथ बबराला के एक इंटर कॉलेज में नौकरी भी हासिल कर ली गई। लेकिन कुछ समय बाद ही मामला खुल गया और हाईकोर्ट में रिट ठोकने के साथ राजभवन में भी शिकायत कर दी गई। फर्जीवाड़े में विश्वविद्यालय के कई अधिकारी और कर्मचारी फंसते नजर आए तो उन्हें बचाने के लिए सारा ठीकरा एक पूर्व कुलसचिव के सिर फोड़ दिया गया जिन्हें स्वर्गवासी हुए भी कई साल हो चुके हैं। इस मामले में अब फिर कुलपति से शिकायत की गई है। सोमवार को इस मामले में हाईकोर्ट में भी सुनवाई है।
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संभल के रहने वाले नरेंद्र सिंह ने राजभवन में शिकायत की थी कि 28 साल पहले राजाराम नाम के शख्स ने बीएड परीक्षा पूरी होने से पहले ही अस्थाई मार्कशीट बनवाकर बीआरएस इंटर कॉलेज बबराला में नौकरी हासिल कर ली थी। विश्वविद्यालय ने बाद में इस मार्कशीट को सत्यापित भी कर दिया। 2002 में इस मामले में बदायूं के डीएम से शिकायत की गई तो उन्होंने जांच के निर्देश दिए। नरेंद्र सिंह की ओर से इस शिकायत में सवाल उठाया था कि 1992 की बीएड परीक्षा के प्रैक्टिकल 30 जुलाई को खत्म हुए तो उसकी अस्थाई मार्कशीट तीन जून 1992 को ही कैसे जारी कर दी गई। राजभवन ने इस पर संज्ञान लेकर रुहेलखंड विश्वविद्यालय से रिपोर्ट मांगी और कार्रवाई करने के निर्देश दिए। विश्वविद्यालय ने तीन सदस्यीय कमेटी से जांच कराई जिसने अस्थाई मार्कशीट को पूरी तरह फर्जी करार दिया।
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इतने पुराने प्रकरण में कौन लोग लिप्त रहे, यह सिर्फ हस्ताक्षर से पहचानना संभव नहीं है। इसलिए साइन और फाइलों पर लिखे नोट की जांच फोरेसिंक एक्सपर्ट से करा ली जाए। मगर विश्वविद्यालय ने कमेटी की सिफारिश को नजरंदाज करते हुए आगे जांच कराने के बजाय सारा ठीकरा तत्कालीन कुलसचिव आरएसी पंत के सिर फोड़ दिया और राजभवन को रिपोर्ट भेज दी। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि पंत 10 साल पहले वह रिटायर होकर उत्तराखंड चले गए थे और अब उनका स्वर्गवास हो चुका है, इसलिए उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई करना संभव नहीं है।
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बच गए सत्यापन करने वाले और मार्कशीट बनाने वाले
विश्वविद्यालय के जवाब पर नरेंद्र सिंह ने सवाल उठाया है। कुलपति को भेजे पत्र में उन्होंने कहा है कि फर्जी मार्कशीट बनाने वाले पर अब तक विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं कराई। उस फर्जी मार्कशीट को सत्यापित करने वाले एक अन्य पूर्व कुलसचिव अभी इलाहबाद के एक विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार हैं। एक कर्मचारी रिटायर हो चुका है, जबकि दो अभी भी विश्वविद्यालय में काम कर रहे हैं।
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