दहेज को लेकर अब तक कई फतवे जारी हो चुके हैं। इस बार दहेज के साथ उसके प्रदर्शन का भी सवाल उठा है। जो शरियत में सख्ती से मना किया गया है। इसे गरीबों का मजाक उड़ाना या बेचैन करना माना गया है।
इस संदर्भ में बीबी जी मस्जिद स्थित दारुल उलूम मजहरे इस्लाम के प्रधानाचार्य मुफ्ती मोहम्मद सगीर अहमद बरकाती ने अपने जवाब में दिए फतवे में कहा है कि शरा में दहेज मांगना मुतलकन हराम और नाजायज है और दहेज को फैशन बनाना विदाते सइया (बुरा) है। जो इस्लाम में नए फितने को जन्म देता है। जबकि फितनागरों की कुरान और हदीस में मज्जमत (निंदा) आई है।
शरा में बीवी को खाना देना, लिबास देना, रहने का ठिकाना देना, मर्द पर लाजिम और जरूरी है मगर सारे समान दहेज के लिए बीवी या उसके वालदैन (माता पिता) पर दबाव डालना सख्त हराम है। लिहाजा दहेज मांगने वाला उसकी नुमाइश करने वाला और औरत को दहेज के लिए परेशान करने वाले पर कहर और अजाब के लायक है। पैगम्बरे इस्लाम ने अपनी बेटी बीवी फातिमा को चक्की घड़ा और खजूर की चटाई आदि दहेज में दी थी बस जवाजे दहेज की यही अस्ल है, मगर मुतालबा करना बहरहाल नाजायज है। आज अगर हर खानखाह और बअसर उल्मा-ए-दीन रहनुमा अपने अपने मानने वालों में इस लानत को खत्म करने के लिए हर जोर कोशिश करें तभी ये सैलाब रुक सकता है।
इस मामले में पम्मी खां वारसी ने दारुल उलूम मजहरे इस्लाम में सवाल डाला था कि आज कल समाज में दहेज की रस्म को फैशन बना दिया गया है। दहेज की वजह से बहुत सी गरीब लड़कियों की शादी में दिक्कतें आती हैं। दहेज की नुमाइश शादी हाल में की जाती है तो इस नुमाइश से और लोगों के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। बहुत से लोग जहेज की मांग करते हैं। मुंहमांगा दहेज न मिलने पर लड़कियों को परेशान किया जाता है। इस तरह की रस्में समाज को नुकसान पहुंचा रही हैं। दहेज की ही वजह से गरीब लड़कियों की शादी में बहुत ज्यादा दिक्कत होती है। ऐसी सूरत में आज कल के लड़कों को क्या करने की जरूरत है इसका हल क्या है कुरान और हदीस की रौशनी में इसका जवाब मांगा।