70 फीसदी डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी हुए थे संक्रमित
बरेली। दुनिया भर में लाखों जिंदगियां तबाह करने वाले कोरोना वायरस के खौफ के बावजूद चिकित्सक अपना फर्ज निभाने से पीछे नहीं हटे। संक्रमित होने के डर के बावजूद वे संक्रमितों की सेवा में अनवरत जुटे रहे। लोगों की जिंदगी बचाने की कोशिश में तमाम डॉक्टर संक्रमित भी हुए। कुछ की सांसें भी थम गईं। एक जुलाई को मनाए जा रहे डॉक्टर्स-डे पर अमर उजाला ऐसे चिकित्सकों के सेवाभाव को साधुवाद देते हुए उनकी स्मृतियों को साझा कर रहा है।
सबको नचाकर गुजर गया ‘आईएमए का रॉकस्टार’
बरेली। कोरोना की चपेट में आकर पिछले दिनों युवा चिकित्सक डॉ. विकास बैजल का निधन हो गया था। उनका यूं जाना परिवार पर वज्रपात से कम नहीं था। आईएमए पदाधिकारी और चिकित्सक हंसमुख, मिलनसार, मरीजों के मददगार साथी के निधन से दुखी हैं। उनके मुताबिक अब ‘आईएमए का रॉकस्टार’ कोई नहीं रहा।
बदायूं रोड के रहने वाले डॉ. विकास बैजल निजी अस्पताल का संचालन करते थे और स्वास्थ्य विभाग के बाकरगंज हेल्थ सेंटर का प्रभार भी संभाल रहे थे। कोरोना काल में संक्रमितों की तादाद बढ़ने पर पिछले साल अगस्त में तीन सौ बेड अस्पताल का संचालन का निर्णय जिला प्रशासन ने लिया। संक्रमण का डर इस कदर हावी था कि यहां कोई भी चिकित्सक तैनाती नहीं चाहता था। ऐसी स्थिति में डॉ. विकास बैजल ने हामी भरी और मरीजों की देखभाल शुरू की। वह कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए ही मरीजों से मिलते थे और उन्हें दवाएं आदि देने के साथ ही, मानसिक तनाव से बचाने का भी प्रयास करते थे। हालांकि, तब वह संक्रमित नहीं हुए। कोरोना की दूसरी लहर में उन्होंने वैक्सीनेशन का चार्ज संभाला।
इसी दौरान डॉ. विकास किसी संक्रमित के संपर्क में आए और फिर लगातार उनकी हालत बिगड़ती गई। कार्डियक अटैक की वजह से उनका निधन हो गया। डॉ. हरमीत पुरी के मुताबिक, उनके निधन की सूचना मिलने ही आईएमए में शोक की लहर दौड़ गई। परिवार टूट गया। उसे संभालने में सभी चिकित्सकों ने सहयोग किया। डॉ. विकास आईएमए के रॉकस्टार थे। डांस कंपटीशन में उनका कोई सानी नहीं था। घूमने के शौकीन होने से वह आईएमए में कैंप मेकर के तौर पर भी पहचाने जाते थे। पत्नी डॉ. सोनिका बैजल और बेटी डॉ. दिव्यांशी बैजल ने डॉ. विकास की उम्मीदों को साकार करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। ब्यूरो
मरीजों के साथ डॉ. पाराशर को पशु-पक्षियों की भी थी फिक्र
बरेली। जिले के जाने माने रेडियोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिक डॉ. अनिल पाराशर का निधन परिवार के साथ ही छत पर मंडराने वाले पक्षियों और उनकी चौखट तक पहुंचने वाले पशुओं के लिए भी तकलीफदेह रहा। बेटी डॉ. मणि पाराशर के मुताबिक, पिताजी मरीजों की जिस लगन से सेवा करते थे, उसी तरह वह पशुओं और पक्षियों का भी ध्यान रखते थे। प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव था। उम्र 58 की थी लेकिन दिल बच्चा था।
मणि ने बताया कि पिता उन्हें और छोटी बहन मेधावी को डॉक्टर बनाना चाहते थे। कहते थे कि जीवन में लोगों की मदद और उनकी सेवा करने का इससे बेहतर और कोई विकल्प नहीं है। कोरोना काल में जब लोगों को दिक्कत थी तब भी वह उनकी मदद को डटे रहते थे। गंभीर रूप से बीमार मरीजों की हालत में सुधार होने तक उनके सिरहाने बैठे रहते थे। उन्होंने घर की छत पर ही गार्डन बना रखा था, जहां वह मरीजों की देखभाल करने के बाद परिवार के साथ वक्त बिताते थे। गार्डन में फूलों के साथ ही औषधीय पौधे भी लगा रखे थे, ताकि जरूरत पर उनका इस्तेमाल किया जा सके। उनका मानना था कि पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधरोपण बेहद जरूरी है। दुनिया क्या कर रही है, यह छोड़कर जो मुमकिन हो सके उसकी खुद शुरुआत करनी चाहिए ताकि लोगों को प्रेरणा मिल सके। मणि ने अपने पिता की तरह ही सम्मानित चिकित्सक के तौर पर लोगों की सेवा का संकल्प लिया है। डॉ. पाराशर की ख्वाहिश थी कि अस्पताल को चैरिटेबल के तौर पर चलाया जाए। आधुनिक मशीनें लगाकर लोगों को सस्ता इलाज उपलब्ध कराया जाए। उनकी यह चाहत अब बेटी मणि पूरी करेंगी। ब्यूरो