‘आजादी के बाद हिंदी का विकास’ विषय पर आयोजित वेबिनार में हिंदी प्रेमियों ने भाषा को लेकर जताई चिंता
बरेली। विभिन्न भाषा और बोलियों वाले देश में हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सभी को जोड़ने का काम करती है। हमारी साझा संस्कृति की दुनिया में पहचान का हिंदी एक सशक्त माध्यम है। संविधान ने इसे राजभाषा का दर्जा दिया है फिर भी कहीं न कहीं अंग्रेजी के सामने हम हिंदी बोलने में हिचकिचाते हैं। बस इसी हिचकिचाहट को दूर करना है। हमें अपनी संस्कृति के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा। यह बात भावी पीढ़ी को समझानी होगी। इसके लिए सभी को आगे आना होगा। तभी हम विश्व में हिंदी को यथोचित स्थान दिला पाएंगे। हिंदी दिवस के पूर्व रविवार को अमर उजाला के हिंदी हैं अभियान के तहत ‘आजादी के बाद हिंदी का विकास’ विषय पर आयोजित वेबिनार में हिंदी प्रेमियों ने भाषा के विकास पर अपने विचार रखे।
हिंदी में हस्ताक्षर करने की आदत डालें
जैैसे अन्य देश अपनी भाषा को लेकर प्रतिबद्ध दिखते हैं, वैसा ही भाव हमें भी पैदा करना होगा। इसकी शुरुआत स्वयं से करनी चाहिए। हिंदी की बात तो बहुत होती है लेकिन अधिकतर लोग हस्ताक्षर अंग्रेजी में ही करना पसंद करते हैं। इस प्रवृत्ति का त्याग करना होगा। हम लोग संकल्प लें कि हम अपने हस्ताक्षर आज से हिंदी में करेंगे। इससे युवा पीढ़ी में एक अच्छा संदेश जाएगा लेकिन हिंदी के विकास में हमें अपनी दृष्टि व्यापक रखनी होगी। अवधी, भोजपुरी जैसी कई सहायक भाषाएं और बोलियां हैं जो हिंदी के उत्थान में बड़ी भूमिका निभाती है। इनका भी विकास करना चाहिए। जैसे अवधी का उदाहरण लें, रामचरित मानस हमारे पास नहीं होती तो हम हिंदी को कैसे जनमानस की भाषा बना पाते। राजकीय स्तर पर भी बहुत सारे प्रयास हिंदी को बढ़ाने के लिए किए जा रहे हैं। हमारी भी जिम्मेदारी है। हम अपने स्तर से हिंदी को उन्नत करने के लिए काम करें। - डॉ. रमेश गौतम, साहित्यकार
हिंदी के प्रति गंभीर नहीं युवा, उन्हें समझाना होगा
आज का युवा हिंदी के प्रति गंभीर नहीं दिखता। छात्र हिंदी की कक्षा में आने से बचते हैं। यह बात चिंतनीय और हिंदी के विकास में बाधक है। सबसे पहले हमें युवा पीढ़ी को हिंदी के महत्व को समझाना होगा। उसे हिंदी की विशालता से अवगत कराना होगा। हिंदी की वर्तनी पर ध्यान देना होगा। तभी भाषा में सुधार होगा। इसके शब्दों का प्रचार प्रसार हर स्तर पर होना चाहिए। कोई भाषा जब अपने सहज रूप में आगे बढ़ती है तभी वह विकास कर पाती है। इसके लिए क्षेत्रीय बोलियों को भी साथ लेकर चलना होगा। हिंदी हमें एक सूत्र में बांधती है। इस भाषा में अपनापन का जो अहसास है, उसकी अभिव्यक्ति कर पाना मुश्किल है। हिंदी को आगे ले जाने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। -डॉ. हेमलता रस्तोगी, असिस्टेंट प्रोफेसर वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी राजकीय महिला महाविद्यालय
हिंदी को आत्मसात कर रहा सोशल मीडिया
हिंदी का उद्गम देवभाषा संस्कृत से हुआ है जो समृद्घ और आधुनिक है। हिंदी वर्णमाला में हर ध्वनि के लिए लिपि और चिह्न है। इसलिए इसके लेखन और उच्चारण में स्पष्टता और सरलता दोनों रहती है। पढ़ाई के समय से ही मेरा हिंदी से लगाव रहा। मैं खुद तो हिंदी को बढ़ावा देती ही हूं। अपनी छात्राओं को भी हिंदी के प्रति समर्पित होने के लिए उत्साहित करती हूं। सोशल मीडिया के इस दौर में हिंदी का प्रयोग बहुत तेजी से बढ़ रहा है। यह अच्छी बात है। लेकिन विश्व स्तर पर हिंदी का झंडा बुलंद करने के लिए इसका और व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिए। - डॉ. गीता अग्रवाल, अध्यक्ष चित्रकला विभाग, साहूराम स्वरूप महाविद्यालय
हिंदी पर होना चाहिए सभी को गर्व
हिंदी भाषा होने के साथ एक-दूसरे के प्रति प्रेम व स्नेह की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसके बिना हम अपने भावों को प्रदर्शित करने में असहज महसूस करते हैं। हिंदी जहां हमें अपनापन का अहसास कराती है, वहीं हमें आगे बढ़ने के तमाम रास्ते दिखाती है। आज के युवा हिंदी अपनाकर शिक्षा, मनोरंजन, विज्ञापन सहित कई क्षेत्रों में अपने भविष्य को संवार सकते हैं। यह भाषा किसी प्रकार का भ्रम नहीं पैदा करती। बड़ी ही सरल और सहज होने के साथ लिखने और बोलने में भी आसान है। हिंदी हमारी संस्कृति की आत्मा है। हम सभी को अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करना चाहिए। - डॉ. ममता सिंह, हिंदी ग्रंथ अकादमी राजस्थान से कई पुस्तकें प्रकाशित