चार माह पहले हरि शयनी एकादशी को सोये देव देवोत्थान एकादशी पर मंगलवार को जागेंगे। इसी के साथ विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक संस्कार शुरू हो जाएंगे। इसी दिन तुलसी सालिगराम का विवाह भी होगा।
शास्त्रों के अनुसार, चार माह से सोए हुए देवों के जागने का दिन देवोत्थान एकादशी कहलाता है। इस बार देवोत्थान एकादशी 31 अक्तूबर को है। आचार्य मुकेश मिश्र बताते हैं कि एकादशी का मान 30 अक्तूबर सोमवार को शाम 7.03 मिनट पर लग जाएगा जो 31 अक्तूबर मंगलवार को शाम 6.55 मिनट तक रहेगा। बता दें कि उदया तिथि पूरे दिन रहने से एकादशी 31 अक्तूबर को ही मान्य होगी। इस दिन से शादियां होनी शुरू हो जाती हैं। विवाह के लिए एकादशी अबूझ तिथि होती है। इसके बाद विवाह मुहूर्त 16 नवंबर से शुरू होंगे। 12 अक्तूबर से अस्त चल रहे गुरु का उदय छह नवंबर को होगा। दरअसल, तारा उदय होने के बाद कुछ दिनों तक के लिए दोष माना जाता है, लिहाजा विवाह मुहूर्त 16 नवंबर से हैं।
इस दिन व्रत-पूजा का है खास महत्व
मान्यता के अनुसार, इस एकादशी पर व्रत और भगवान विष्णु के पूजन का बहुत महत्व है। इस दिन जागरण करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। पूजा से इस दिन अथाह ज्ञान की भी प्राप्ति होती है। इसीलिए इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।
ऐसे करें पूजन
इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप दिखाकर और घंटा, शंख बजाकर भगवान को जागाएं। इसके बाद गंगाजल, पंचामृत से स्नान कराकर रोली, चंदन, अक्षत, पुष्प, गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद आदि से पूजन करें और आरती उतारें।
होगा तुलसी-शालिग्राम विवाह
शहर में देवोत्थान एकादशी के उपलक्ष्य में शहर में कई जगह तुलसी शालिग्राम विवाह होंगे। मान्यता है कि तुलसी कन्या दान का संकल्प हजारों कन्याओं के संकल्प के बराबर है। तुलसी विवाह पूजन से कई जन्मों के पापों का शमन होता है। राधाकृष्ण मंदिर मारबाड़ी गंज के पुजारी पंडित रमाकांत दीक्षित ने बताया कि इस दिन कई लोग अपने घरों में तुलसी विवाह करते हैं। ठाकुर जी के मंदिर से बैंड बाजों के साथ शालिग्राम को लाया जाता है। वहां विधि विधान से विवाह कर तुलसी को विदा किया जाता है।