बरेली। वेंटिलेटर बेड के लिए दो दिन तक अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद सुभाषनगर के एक व्यापारी की एंबुलेंस में ही सांसें थम गईं। कोई अस्पताल उन्हें भर्ती करने तक को तैयार नहीं हुआ। आखिरी उम्मीद के तौर पर परिवार के लोग उन्हें जिला अस्पताल ले गए लेकिन वहां से भी उन्हें रेफर कर दिया गया।
सुभाषनगर में कालीचरण मार्ग वाली गली में रहने वाले व्यापारी ललित मोहन गर्ग की तीन-चार दिन पहले अचानक तबियत खराब हुई थी। सुभाषनगर में ही एक डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि छाती में संक्रमण है। इसके बाद डॉक्टर ने उन्हें अपने यहां भर्ती करने के बजाय हायर सेंटर रेफर कर दिया। ललित मोहन के बेटे मनोज ने उन्हें लेकर तमाम अस्पतालों के चक्कर लगाए लेकिन कोई भर्ती करने को तैयार नहीं हुआ। 22 अप्रैल को ललित मोहन बमुश्किल दीपमाला अस्पताल में भर्ती हो पाए मगर यहां उनकी हालत धीरे-धीरे और बिगड़ती गई।
मनोज के मुताबिक 23 अप्रैल की रात डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनके पिता को वेंटिलेटर की जरूरत है जो अस्पताल में खाली नहीं है लिहाजा वह किसी दूसरे अस्पताल में वेंटिलेटर बेड की व्यवस्था कर लें। मनोज ने बताया कि उन्होंने कई अस्पतालों में बात की। अंतत: ग्लोबल अस्पताल के डॉक्टर ने उन्हें वेंटिलेटर बेड देने की हामी भरी लेकिन शनिवार सुबह पांच बजे वह एंबुलेंस में अपने पिता को लेकर ग्लोबल अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर वेंटिलेटर बेड देने की बात से मुकर गए।
इसके बाद परिवार के लोगों ने ललित मोहन को एंबुलेंस में लेकर रुहेलखंड मेडिकल कॉलेज, गंगाचरण, सांई सुखदा, लीलावती समेत कई अस्पतालों के चक्कर काटे लेकिन कोई भी अस्पताल वेंटिलेटर देना तो दूर, उन्हें भर्ती करने तक को तैयार नहीं हुआ। एसीएमओ का फोन भी नहीं लगा। आखिर में निराश परिवार वाले ललित मोहन को जिला अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने उनकी हालत बहुत ज्यादा गंभीर बताते हुए उन्हें एसआरएमएस रेफर कर दिया। एसआरएमएस में भी उन्हें भर्ती नहीं किया गया। इसी बीच ललित मोहन की सांसें भी थम गईं।
एंटीजन टेस्ट में निगेटिव, चार दिन बाद
भी नहीं आई आरटीपीसीआर रिपोर्ट
दीपमाला अस्पताल में ललित मोहन का एंटीजन टेस्ट कराया गया जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई। इसी के साथ आरटीपीसीआर जांच के लिए भी उनका सैंपल लिया गया जिसकी रिपोर्ट आने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया।
आपदा में अवसर... तीन घंटे के
एंबुलेंस वाले ने मांगे 35 हजार
ललित मोहन के बेटे मनोज के मुताबिक एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज पहुंचने पर पता चला कि उनके पिता की मौत हो चुकी है। इसके बाद ड्राइवर ने वहीं एंबुलेंस रोक दी और अपने किराए की बात करने लगा। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल जाने के पांच हजार रुपये और जिला अस्पताल से एसआरएमएस आने का 15 हजार रुपये किराया बताते हुए उसने 35 हजार रुपये मांगे। बमुश्किल पांच हजार रुपये कम करके 30 हजार रुपये पर माना। मनोज ने बताया कि सुबह पांच बजे एंबुलेंस उनके पिता को लेने पहुंची थी और आठ बजे उन्होंने दम तोड़ दिया। सिर्फ तीन घंटे के उन्हें तीस हजार रुपये देने पड़े। इसके बावजूद एंबुलेंस ड्राइवर बमुश्किल शव सुभाषनगर में उनके घर तक लाने को राजी हुआ।